Monday, November 30, 2020

छत्तीसगढ़ राज्य सेवा परीक्षा - प्रारंभिक परीक्षा का मूल्यांकन

पूर्व वर्षो की भांति इस बार  भी 26 नवम्बर को राज्य सेवा परीक्षा की अधिसूचना जारी हो गयी है जैसा कि आप सभी को पता है प्रारंभिक परीक्षा 14 फरवरी को और मुख्य परीक्षा 18 जून से 21 जून को निर्धारित की गई है ।         इस प्रकार लगभग अढ़ाई माह  का समय प्रिलिम्स में लिए और प्रिलिम्स के बाद 4 माह का समय मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यर्थियों को मिलेगा। पुराने छात्र अपने अपने अनुभव के पैमाने पर तैयारी करेंगे लेकिन नए छात्र या ऐसे भी पुराने छात्र जो पिछली बार गंभीर होकर परीक्षा नहीं दिए होंगे उनके लिए यह अच्छा मौका है । परीक्षा की तैयारी , आने वाली बाधाओं और परिणाम को लेकर बिंदुवार चर्चा करते है । 1)  कुल पदों की संख्या 143 है जिसमें 30 डिप्टी कलेक्टर के और 4 डीएसपी (बैकलॉग 2)  सहित लेखाधिकारी के 15 पद शामिल है . द्वितीय श्रेणी अधिकारी के कुल पद 79 है जो बड़े आंकड़े है । पदों की संख्या बढ़ने की प्रबल संभावना हैं । 2)  आवेदन करने की तिथि 14 दिसम्बर 2020 से 12 जनवरी 2021 तक है लगभग 1 माह का समय इसके लिए दिया गया है कोई भी स्नातक छात्र आवेदन कर सकता है उसकी उम्र 21 वर्ष से अधिक होनी चाहिए । 3) तैयारी प्रारम्भ करने से पूर्व छात्र परीक्षा प्रणाली , सिलेबस और पेपर का स्तर के बारे में अवश्य जान ले जिसे आगे मैं चर्चा करने वाला हूँ । प्रतिवर्ष परीक्षा में लगभग 1 लाख छात्र फार्म भरते है और 70 से 80 हजार छात्र परीक्षा केंद्र तक पहुँच पाते है । 4) छात्रों को यह जानकारी होना चाहिए कि कुल पद का 15 गुना अभ्यर्थी प्रारंभिक परीक्षा में मेरिट के आधार पर चयनित होते है और यही 15 गुना अभ्यर्थी को मुख्य परीक्षा में बैठने का मौका मिलता है जिसमें कुल का पद का 3 गुना अभ्यर्थी मेरिट आधार पर साक्षात्कार के किये चयनित होते है । तत्पश्चात मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार का नम्बर जुड़कर मेरिट लिस्ट तैयार होता है जिसमें रैंक और वरीयता अनुसार आरक्षण को ध्यान रखकर पदों का वितरण किया जाता है । 5)  प्रारंभिक परीक्षा में नेगेटिव मार्किंग का प्रावधान है जो एक तिहाई है अर्थात 3 प्रश्न गलत होने पर 1 सही प्रश्न का नम्बर भी कम हो जाएगा । इसलये अभ्यर्थी सोच समझकर ही प्रश्नों का उत्तर दें । 6) प्रारंभिक परीक्षा के लिए दो परीक्षाएं आयोजित होती है प्रथम सामान्य अध्ययन का और दूसरा एप्टीट्यूड का जिसे सीसैट भी कहते है । द्वितीय पेपर सीसैट का अर्हरकारी होता है अर्थात इसमे सिर्फ पास होना जरूरी है इसके नम्बर मेरिट में महि गिने जाते है इस पेपर में 33 % लाना अनिवार्य है । सबसे महत्वपूर्ण पहला पेपर सामान्य अध्ययन का होता है जिसके नम्बर के आधार पर ही मेरिट तैयार होता है । दोनो पेपर के लिए 100-100 प्रश्न निर्धारित रहते है और समय 2 -2 घण्टे निश्चित है । 7) प्रथम पेपर सामान्य अध्ययन का 2  भागों में बंटा है जिसमें 50 प्रश्न भारत के सामान्य ज्ञान से और 50 प्रश्न छत्तीसगढ़ के सामान्य ज्ञान से सम्बंधित पूछे जाते है । तैयारी के पूर्व अभ्यर्थी सिलेबस का और पूर्व वर्षों में हुए पेपर का अध्ययन अनिवार्य रूप से करें । हो सके तो सिलेबस को याद कर लेवे । 8) अभी से मुख्य परीक्षा के बारे में न सोचें अपना पूरा फोकस प्रीलिम्स परीक्षा में रखे । सिलेबस के अनुसार ही प्रश्न आता है जिसमे छत्तीसगढ़ , इतिहास , संविधान , और पंचायती राज का वेटेज अधिक होता है अतः इस विषयों का अध्ययन गहन रूप से करें । समय कम है ऐसा न सोचें ढाई माह का समय पर्याप्त है आपको नोट्स  का चयन बहुत सोच समझकर और सावधानी से करना है । सीसैट पेपर को ध्यान में रखना है और प्रतिदिन 1-2 घंटे देना है इसके लिए भाषा हिंदी और छत्तीसगढ़ी को अधिक फोकस करें । गणित और रीज़निंग भी हल करते चले। 9) ऐसे नोट्स पढ़े जिसमे तथ्यात्मक जानकारी अधिक और प्रामाणिक हो एक ही नोट्स को कई बार रिवीजन अवश्य करें । इसे पढ़ने में बाद पूर्व परीक्षाओं का प्रश्न हल करें । लुसेंट का बुक और किसी कोचिंग संस्थान का नोट्स आपका सही मार्गदर्शन कर सकते है यह देखना आवश्यक है कि नोट्स में त्रुटि अधिक न हो । प्रश्न को हल करने के लिए घटनाचक्र बुक का सहारा लें । करेंट अफेयर्स के लिए अनावश्यक परेशान नहीं होना है मंथली प्रतियोगिता दर्पण पढ़ सकते है । करेंट के लिए जरूरी है विश्वसनीय कोचिंग संस्थान का परीक्षा के कुछ दिन पूर्व आने वाले नोट्स का अध्ययन अवश्य करें । 10) अभ्यर्थी को ध्यान में रखना है कि परीक्षा के 20 दिन पूर्व अपना सिलेबस पूर्ण करले । जितना पढ़े है उसका रिवीजन अत्यावश्यक है प्रतिदिन 8-10 घण्टे पढ़ना अनिवार्य है । 15 दिन पूरा रिवीजन में दे बचे 5 दिन करेंट अफेयर्स के लिए रखे और कोशिस करें कोई भी तथ्यात्मक जानकारी न छूटे । स्वस्थ मन से परीक्षा में बैठे और सामान्य अध्ययन के पेपर में कम से कम 80% प्रश्न को हल करने का प्रयास करें अगर प्रश्न का स्तर सरल है तो 90 प्रश्न हल कर सकते हैं । यहां ध्यान रखना आवश्यक हैं कि कम प्रश्न हल करके आप चयनित नहीं हो सकते क्योंकि विगत वर्षों में कॉम्पिटिशन बढा है और ऋणात्मक मूल्यांकन एक तिहाई है । इसलिये जोखिम लेना जरूरी हैं पाठक कोई भी जानकारी सवाल कमेंट बॉक्स में लिख सकते है

Friday, November 13, 2020

नए कृषि कानून और विवाद

           17 सितंबर को लोकसभा में पास कृषि सुधार के तीन बिलो को लेकर कई राज्यों के किसान सड़क पर है । विपक्ष के सभी दल विरोध कर रहे है साथ ही सरकार की सहयोगी अकाली दल भी किसानों के साथ खड़ी है और विरोध कर रही है । 

           विरोध का मुख्य कारण तीनो बिलो में किये प्रावधानों को लेकर है जो निम्न है -

1) किसान अपना उपज स्थानीय विपणन समिति के अलावा कही भी विक्रय कर सकता है । न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार खत्म नहीं करेगी और सरकारी खरीद भी जारी रहेगी ।

2) आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव से अब स्टॉक की अधिकतम सीमा हटा दी गयी है अर्थात व्यापारी अब कितना भी समान अपने गोदामो में रख सकता है । 

3) अब किसान अपनी  जमीन ठेका पर दे सकता है अर्थात ठेका कृषि को प्रोत्साहन। 


        उपरोक्त प्रावधानों  के विरोध का मुख्य कारण और इस पर किसान संगठनों की राय है -- 

1) सरकार जब अभी MSP नही दिला पा रही है तो निजी खरीद प्रक्रिया से तो और संभव नही है। इससे किसान का माल  और कम मूल्य में खरीदा जाएगा । 

2 ) स्टॉक की सीमा तय नहीं होने से कालाबाजारी बढ़ेगा और व्यापारी गोदामो में अधिक माल को रख सकेंगे । 

3) ठेका पर खेती होने से सरकार सब्सिडी खत्म कर देगी और मुआवजा आदि भी खत्म हो जाएगा किसान से जमीन छिन जागेगी और कृषक ,मजदूर बन जाएंगे । 


          सरकार का मत है इस बिल से किसानों फायदा होगा और ये क्रांतिकारी परिवर्तन है । 

1) सरकार बाजार में प्रतियोगिता को बढ़ावा देना चाह रही है ताकि किसान के फसल का मूल्य बढ़े और कही भी बेच सके वन नेशन वन मार्किट । 

2) स्टॉक की सीमा हटने से बड़ी कंपनियां किसानों से माल खरीदेगी और गोदामो में रख सकेगी।

3) ठेका कृषि वर्तमान की जरूरत है जहाँ खेती के रकबे के कमी और चको का आकार छोटा हो रहा है वहां ठेका खेती से छोटे किसान लाभान्वित होंगे। 

4) सरकार MSP खत्म नहीं करेगी जिससे मंडी में बेचना है वो बेच सकते है। 


            कृषि विशेषज्ञ और किसान इसे किसान विरोधी मानते है उनका कहना है इससे पहले जैसे समस्या  निर्मित हो सकती है जब सेठ साहूकार कम दाम में किसानों से उपज खरीद स्टोर कर लेते थे । इससे भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य भी किसान खो सकते है तथा खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा । बहुराष्ट्रीय कंपनियां का अतिक्रमण बढ़ेगा  । विपक्ष का कहना की सरकार सारी व्यवस्था कुछ पूंजीपतियों के हाथ मे देना चाहती है वैगरह वैगरह । 

        इसके आलोक में यक्ष प्रश्न यह है कि - 

* क्या पूर्व स्थिति संभव है जब बाजार का विस्तार हो गया है । अब बाजार का स्वरूप  प्रतियोगी है । 

* विपणन समिति में व्याप्त अनियमितता जिसका नुकसान किसानों को होता है । 

* कृषि को आधुनिक बनाना ठेका कृषि आदि से नगद फसल को बढ़ावा मिलेगा । 

* खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है यह चिंतन का विषय है । 

*  सरकार कृषि सब्सिडी, मुआवजा  , खाद्य सुरक्षा का दायरा कम करना चाहती है ( शांता कुमार समिति की रिपोर्ट 2014 में गठित) 

*  MSP की गारंटी और कंपनियों का कब्जा? 

कृषि मजदूर न बने । 


      उपरोक्त प्रश्न के अलावा विचारणीय है कि यूरोप में ऐसा मॉडल कामयाब नही रहा ।


बिहार में 14 वर्ष पूर्व APMC  खत्म किया गया लेकिन किसानों का सर्वाधिक पलायन बिहार से ही हुआ और व्यवस्था नही सुधर पाई । 

          जब बिल किसानों के हित में है तो किसान संगठनों और नेताओं को विश्वास में  लेना जरूरी है  लेकिन  जब जून में अध्यादेश आया था  तब सब चुप क्यो थे। सरकार ने पूर्व में पारित अध्यादेश को कानून का रूप दिया तब विवाद खड़ी हुई इसमें  राजनीति भी जमकर हो रही है । 

       APMC के सुधार लेकर ये चर्चा नया नही है । अब बात न्यूनतम समर्थन मूल्य की तो ...सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे देश मे सिर्फ 6 प्रतिशत किसान ही इसका लाभ उठा पाते है सिर्फ 6 प्रतिशत । क्या इस व्यवस्था से कंपनियों का एकाधिकार स्थापित होगा या किसानों को अपनी उपज का सही दाम मिलेगा , ठेका कृषि से कृषि को व्यापारिक दर्जा हासिल होगा और क्या किसान 2022 तक अपनी आय दुगुना कर सकेंगे। 


Tuesday, November 10, 2020

फ्रांस मे अभिव्यक्ति की आजादी बनाम धार्मिक कट्टरता और उसके वैश्विक प्रभाव

        बीते दिनों फ्रांस में एक शिक्षक द्वारा पैगम्बर हजरत मोहम्मद के विवादित कार्टून दिखाए जाने से उसकी गला रेतकर हत्या एक कट्टर मुस्लिम युवक द्वारा कर दी गयी। वहां की सरकार ने विवादित कार्टून दिखाए जाने को लेकर शिक्षक का समर्थन किया और अपनी अभिव्यक्ति के आजादी की सुरक्षा को लेकर आतंकवाद का कड़े शब्दों में निंदा की । यह कार्टून फ्रांस की प्रसिद्ध मैगजीन 'शार्ली हेब्दो' के थे जिसे लेकर पूर्व में विवाद हो चुका है । 

       फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल मैक्रो ने इसे कट्टर इस्लामी आतंकवाद का हमला कहा और उन्होंने इस्लाम को संकट में बता दिया ,इस्लामी चरमपंथी से निपटने में कठोर कार्यवाही की बात कही । उनके इस बयान से समस्त मुस्लिम देश और  विश्व के मुस्लिम विरोध में उतर आए और विभिन्न तरीकों से विरोध दर्ज कराया । तुर्की और पाकिस्तान इसमें सबसे अगुवा रहे । तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयब एर्दोगन ने  फ्रांस के राष्ट्रप्रमुख को मानसिक इलाज करवाने की सलाह  दे दी और फ्रांस के समान का बहिष्कार का आह्वान किया और यही हाल पाकिस्तान का भी था । पाक ने संसद से एक प्रस्ताव पास कर फ्रांस से अपने राजदूत को वापस बुलाने का कदम उठाया बाद में पता चला की उनका फ्रांस में कोई राजदूत ही नही हैं । मलेशिया के 95 साल के पूर्व राष्ट्रपति महातिर मोहम्मद ने तो सारी हदें पार कर दी और इस हमले को जायज ठहराया।  सऊदी अरब , ईरान , कतर आदि इस्लामिक राष्ट्र ने फ्रांस के समान का बहिष्कार कर विरोध प्रकट किया। 

          इसी बीच फ्रांस में लगातार और भी आतंकवादी हमले हुए , चर्च में तीन बेकसूर लोंगो की गला रेतकर हत्या कर दी गयी । सउदी अरब में फ्रांस के उच्चायुक्त कार्यालय के बाहर गार्ड पर चाकू से हमला कर दिया गया ।                                   

             विदित है कि फ्रांस की कुल आबादी का 9 प्रतिशत मुस्लिम है और ज्यादातर मुस्लिम शरणार्थी के रूप में फ्रांस में आये है । फ्रांस एक ऐसा राष्ट्र है जो  धर्मनिरपेक्षता को केंद्र में रख अभिव्यक्ति की आजादी  , समानता ,  और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वाधिक महत्व देता है । धर्मविहीन राज्य ही फ्रांस के राष्ट्रधर्म है और वहां ' लैसीते ' की अवधारणा प्रचलित है जिसका अर्थ है आम आदमी या जो पादरी नहीं है । इसका मतलब है कि व्यक्ति को मजहबी  स्वतंत्रता होगी लेकिन वह कानून के दायरे में होगी कानून से  बड़ा  कोई नहीं है। फ्रांस ने पहले ही सार्वजनिक स्थल पर धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल पर रोक लगा दिया है । एक अनुमान के मुताबित फ्रांस में  1950 तक धर्म से मुक्त लोंगो की संख्या धर्म पालन करने वालो से अधिक होगी और यही फ्रांस की राष्ट्रीय पहचान है । उनका मानना है कि फ्रांस में रहना है तो इन नियमो का पालन करना होगा ।

        यहां यह बात जानना जरूरी है की फ्रांस को विश्व मे अगर कोई देश का मजबूती से साथ मिला तो वह भारत है । भारत के विदेश मंत्रालय ने बकायदा एक सर्कुलर जारी करते हुए आतंकवादी हमले की निंदा की और इससे निपटने में फ्रांस के साथ देने के बात दोहराई । भारत और फ्रांस के वैदेशिक संबंध मजबूत है और विभिन्न समय पर फ्रांस ने भारत की मदद की है इसलिए भारत को ऐसा करना जरूरी भी था । भारत और फ्रांस में कई बातों को लेकर समानता है जैसे मुस्लिम दोनो जगह अल्पसंख्यक है ,दोनो लोकतंत्र है और समानता ,स्वतंत्रता और बंधुत्व दोनो के राजकीय आदर्श है , दोनो देश  कई बार आतंकवादी हमलों से आहत हुए है । 

        यहाँ एक बात महत्वपूर्ण है कि धर्मनिरपेक्षता को लेकर दोनों के विचार में मामूली अंतर है जहाँ फ्रांस राज्य और व्यक्ति को धर्म से मुक्ति का पक्षधर है  वही भारत सभी धर्मों को राज्य से पृथक तो करता है  परंतु अबाध रूप से मानने की स्वतंत्रता भी देता है .। भारत के संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों का हिस्सा है । 


       यह गौर करने वाली बात है कि अधिकतर मुस्लिम देश में लोकतंत्र नहीं है या है भी तो सिर्फ नाममात्र और स्वयं जिस देश मे मुस्लिम आबादी अधिक है वहां धर्मनिरपेक्षता सिर्फ एक जुमला है इसका उदाहरण हम पाकिस्तान , बांग्लादेश या अफगानिस्तान में देख ही रहे है कि कैसे वहां अल्पसंख्यक पर लगातार हमले हुए है और उनको कोई विशेषाधिकार नहीं है इसके विपरीत भारत में सभी धर्म के लोग आपसी सद्भाव और  बंधुत्व से रहते है साथ अल्पसंख्यकों में लिए विभिन्न योजनाएं भी लागू है । भारत में मुस्लिमो की जनसंख्या लगभग 17 करोड़ से अधिक है और हिन्दू धर्म के बाद सर्वाधिक माने जाने वाला धर्म है । 

     अरब के बहुत देश मे धर्म को लेकर या अन्य किसी  कारण से गृह युद्ध चल रहा है और आये दिन सत्ता संघर्ष या चरमपंथी  हमले में कई लोग अपना जान गवां देते है इसके कारण बड़ी मात्रा में पलायन  यहां से यूरोप के देशों में हुआ है और लगातार जारी है । शरणार्थी समस्या एक बड़ी समस्या विश्व के देशों में रही है । रोहिंग्या संकट हमारे सामने है । रोहिंग्याओ को किसी भी देश ने शरण देने से साफ मना कर दिया और वे स्टेटलेस हो गए  वे विभिन्न शरणार्थी कैम्पों में रहने को अभिशप्त है । 


       विभिन्न देश जो स्वयं को मुस्लिम राष्ट्र घोषित कर चुके है वहां ' ईशनिंदा' से सम्बंधित कानून है अर्थात वहां ईश्वर की आलोचना करना या उनके बारे में अपशब्द कहने पर मृत्यु से लेकर आजीवन कारावास की सजा है । इस संबंध में एक अध्ययन के मुताबिक जहाँ ईशनिंदा कानून है वहां धार्मिक हिंसा और धर्म परिवर्तन की घटना अधिक देखी गयी है । एक संबंध में दोहरा रवैया भी देखने को मिलता है जब पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देश चीन में हो रहे उइगूर मुस्लिमों पर अत्याचार की  घटना पर चुप रहते है और दूसरे देशों को इस पर घेरने से नही चूकते । 


     पूरी विश्व जहां भूमंडलीकरण के कारण एक हो रही है वहां ऐसे धार्मिक झगड़े और कट्टरता से विश्व समुदाय को नुकसान ही है । विभिन्न मतों का सम्मान और उपहास व्यक्तिगत मामला हो सकता है लेकिन उसे समुदाय विशेष से जोड़ना और ध्रुवीकरण करना धार्मिक उन्माद ही पैदा करेगा, जहाँ आवश्यकता है संस्कृतिकरण और आपसी सद्भाव का वहां किसी भी धर्म को "सामी धर्म " होना समस्या ही उत्पन्न करेगा । 

      

    

        

गांधी युग पार्ट -2 सविनय अवज्ञा आंदोलन

      1929 में लेबर पार्टी की सरकार बनी जिन्होंने गवर्नर जनरल लार्ड इरविन को इंग्लैंड बुलाया और मंत्रणा की जिसके अनुरूप इरविन ने घोषणा की ..भारत को अंत में औपनिवेशिक स्वराज्य दिया जाएगा जिसे लेकर गांधी ने इरविन से भेंट की लेकिन गांधी जी के पूछने पर उन्होंने पर्याप्त आश्वासन नहीं दिया इसी बीच लाहौर में कॉंग्रेस का अधिवेशन हुआ अब तक यह निश्चित हो गया कि नवगठित ब्रिटिश सरकार भी कुछ देने वाली नहीं है । 

      तब क्षोभ और निराशा के माहौल में अधिवेशन  बुलाया गया जिसमें पूर्ण स्वाधीनता के प्रस्ताव पास किये किये गए तथा रावी नदी के  31 दिसम्बर 1929 को मध्यरात्रि में तिरंगा फहराया गया और प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस मनाने का निर्णय लिया गया । 

       सरकार द्वारा नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकृत कर दिया गया था था , कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में गांधी जी द्वारा प्रस्तुत 11 मांगे नहीं मानने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन की चेतावनी दी गयी । परंतु ब्रिटिश सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया और प्रसिद्ध दांडी यात्रा से नमक कानून का उल्लंघन कर " सविनय अवज्ञा आंदोलन " का श्री गणेश किया गया । 

   इस आंदोलन के  कार्यक्रम में नमक बनाना , विदेशो वस्रों की होली , शराब -अफीम की दुकानों पर धरना , अश्पृश्यता का त्याग , सरकारी शिक्षण संस्थानों का त्याग तथा जंगल कानून तोड़ा गया । सरकार ने आंदोलन को बढ़ता देख तीव्र दमन चक्र चलाया और बड़ी मात्रा में गिरफ्तारी , जेल भरो , सरकार ने संपत्ति की नीलामी और बलात ग्रहण किया , कॉंग्रेस को अवैध संगठन घोषित कर दिया 

       इन्ही परिस्थितियों में  प्रथम गोलमेज सम्मेलन नवम्बर 1930 में बुलाया गया जिसमें कांग्रेस  ने भाग नही लिया। ब्रिटिश शासन को समझ आ गया कि कांग्रेस से बातचीत किये बिना समस्या का हल नही होगा और इरविन , गांधी जी से बात करने राजी हो गए । 

        1931 में  प्रसिद्ध  गांधी  इरविन समझौता हुआ कुछ कांग्रेसी इस समझौते से प्रसन्न नहीं थे , सुभाषचंद्र बोस और उनके समर्थकों ने तीव्र असंतोष प्रगट किया उनका मत था इतने बड़े बलिदान पर विशेष लाभ नहीं मिला । युवा वर्ग निराश इसलिए थे क्योंकि गांधी जी ,भगतसिंह और उनके साथी की सजा परिवर्तित नहीं करा सके । 1931 में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया गांधी जी इसमें शामिल हुए इस सम्मेलन से कोई समस्या का हल नहीं निकला और सम्मेलन पूरी तरह असफल रहा । 

       विलिंगटन भारत ने नए गवर्नर जनरल बनें उन्होंने गांधी इरविन समझौत के सभी शर्तों भंग करना आरंभ किया । गांधी जी पुनः सविनय आंदोलन प्रारम्भ कर दिए जिसका कठोर दमन किया गया । गांधी जी को बंदी बना जेल में डाल दिया कांग्रेस को अवैध संगठन घोषित कर दिया , समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया । 1934 में आंदोलन स्थगित हो गया । 

    सविनय अवज्ञा आंदोलन की खास बात रही इसमे महिलाओ ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया विभिन्न स्थानों पर जंगल सत्याग्रह से लोंगो में ब्रिटीश सरकार का विरोध करने की हिम्मत आयी , और निराशा के दौर में स्वतंत्रता संग्राम को हवा देती रही । ब्रिटिश सरकार अब भारतीय नेतृत्व गांधी जी से समझौता करने की स्थिति में आ गयी थी । 

Saturday, October 31, 2020

गांधी युग - स्वतंत्रता आंदोलन पार्ट-1 असहयोग आंदोलन

       स्वतंत्रता आंदोलन में 1918 से 1947 का दौर गांधी युग कहलाता है । इस समय आंदोलन का नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया था । वे इससे पहले दक्षिण अफ़्रीका में सत्याग्रह का सफल प्रयोग अंग्रेजो के खिलाफ कर चुके थे गांधी जी 1915 मे भारत आये और चम्पारण्य, खेड़ा व अहमदाबाद में सत्याग्रह का सफलतापूर्वक नेतृत्व किये । गांधी जी का स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश अंग्रेजो के सहयोगी के रूप में हुआ था उन्हें अंग्रेजो की न्यायप्रियता में विश्वास था और प्रथम विश्व युध्द में उन्हें सहायता देने की अपील  भी की थी । 

      अंग्रेजो द्वारा मार्च 1919 में लाया गया रौलेट एक्ट और फिर 13 अप्रैल 1919 में घटित जलियांवाला बाग हत्याकांड ऐसी घटनाएं थी जिसने देश को झकझोर दिया और इन्ही घटना के परिणामस्वरूप गांधी जी अंग्रेजो के सहयोगी से विरोधी हो गए । इसी समय खिलाफत आंदोलन हुआ जो टर्की में खलीफा के पद की बहाली के लिए मुस्लिमों का आंदोलन था जिसमें गांधी जी ने अपने समर्थन दिए और स्वतंत्रता आंदोलन में हिन्दू मुस्लिम एकता पर बल दिया ।  

         इन्ही परिस्थितियों में गांधी जी कांग्रेस के नागपुर सम्मेलन से शांतिपूर्ण , अहिसंक असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पास कराने में सफल हुए और कार्यक्रम की रूपरेखा तय की गई । असहयोग आंदोलन में दो पक्ष थे -

* प्रथम निषेधात्मक कार्यक्रम जिसमें  ब्रिटिश राजनीतिक , सामाजिक , आर्थिक संस्थाओ का बहिष्कार करना और पूरी सरकारी मशीनरी को ठप्प करना था ।

* दूसरा रचनात्मक कार्यक्रम जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय स्कूल की स्थापना , राष्ट्रीय पंचायत का गठन , स्वदेशी अपनाना , हथकरघा ,कुटीर उद्योग को महत्व और अस्पृश्यता का अंत । 

          आंदोलन प्रारम्भ होते ही महत्वपूर्ण नेताओ  ने अपनी उपाधियां त्याग दी , अनेको ने सरकारी नौकरी का परित्याग किया विद्यार्थियों ने शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार किया । हिन्दू मुस्लिम एकता इस आंदोलन की विशेष बात थी । 

      1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन का विरोध और बहिष्कार किया गया ।अंग्रेज अधिकारियों ने तीव्र दमन चक्र चलाया , महत्वपूर्ण नेताओ को गिरफ्तार कर लिया । गांधी जी  ने वायसराय को चेतावनी दी की सरकार ने दमन नीति में परिवर्तन नहीं कि तो आंदोलन और तेज किया जाएगा जिसमें  'कर न दो'  कार्यक्रम शामिल होगा । 

          5 फरवरी 1922 को उत्तरप्रदेश के चौरीचौरा नामक स्थान पर उग्र भीड़ ने थाने में आग दी जिसमे 21 पुलिसवाले मारे गए । गांधी जी आंदोलन को उग्र होता देख आनन फानन में 11 फरवरी 1922 को आंदोलन वापसी की घोषणा कर दी । भारतीय जनता में आंदोलन वापसी से निराशा की लहर दौड़ गयी सुभाषचंद्र बोस , मोतीलाल नेहरू , लाला लाजपत राय के मना करने के बाद भी गांधी जी नही माना । उन्हें तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा और जनता इसे राष्ट्रीय अपमान समझी । 

        इस आंदोलन को देश का प्रथम जनांदोलन कहा जाता है इस आंदोलन से लोंगो में त्याग और साहस की भावना का संचार हुआ जनता में निर्भीकता आ गयी और अब वह विद्रोह करने से नही डर रही थी इसके अलावा रचनात्मक कार्यक्रम खादी , चरखा स्वदेशी का देश को बड़ा लाभ हुआ । 

Friday, October 30, 2020

स्वतन्त्रता आंदोलन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

        स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक महत्वपूर्ण संगठन के रूप में उभरा 1885 में अपनी स्थापना के 21 वर्ष बाद 1907 में यह दो भागों में बंट गयी जिन्हें क्रमशः नरम व गरम दल कहा गया । 

     1885 से 1905 तक का समय उदार या नरम राष्ट्रीयता का काल कहलाता है इसमें कॉंग्रेस में उदार नेतृत्व का प्रभाव था ये क्रमिक सुधार में विश्वास करते थे इन्हें अंग्रेजो की न्यायप्रियता में विश्वास था ये ब्रिटेन के साथ सम्बन्ध भारत के हित में समझते थे । इनकी कार्यपद्धति प्रार्थना पत्र, स्मरण पत्र और प्रतिनिधि मंडल वाली थी ये सीधे आंदोलन के विरोधी थे। इनकी दुर्बलताएं यह थी कि इनकी पद्धति लोकप्रिय नही थी और न ही ये जननेता बन पाए  । देशभक्त तो थे लेकिन ये ब्रिटेन के प्रति राजभक्ति भी रखते थे जो परस्पर विरोधी स्वभाव  का है  । 

        उदारवादियों की कुछ सफलता भी रही उन्होंने ब्रिटिश शासन का दोष स्पष्ट किया भारतीयों में राजनीतिक शिक्षा की अलख जगायी और स्वतंत्रता आंदोलन का आधार तैयार किया इसलिए उन्हें भारतीय राष्ट्रीयता का जनक भी कहते है । ब्रिटिश सरकार ने भारतीय परिषद अधिनियम 1892 पारित की जो इन्ही के आवाज उठाने के परिणामस्वरूप थी । 

           1906 से 1919 कांग्रेस का उग्र राष्ट्रीयता का काल कहलाता है जिसमे लाल- बाल -पाल अर्थात लाला लाजपत राय , बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल की प्रमुख भूमिका रही । इनकी लोकप्रिय होने के प्रमुख कारण थे उदारवादियों की अनुनय विनय की नीति की असफलता तथा धार्मिक पुनरुत्थान वाद , विदेशो में भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार, पश्चिमी क्रांतिकारी विचारों का प्रभाव , महामारी के समय अंग्रेज अधिकारियों की उदासीनता , लार्ड कर्जन की प्रतिक्रियावादी नीति । उपर्युक्त कारण के आलावा 1892 के अधिनियम की लचर व्यवस्था से गरम दल का वर्चस्व बढा । 

       1907 में कांग्रेस में फूट पड़ गयी अग्रेजो ने इसका लाभ उठाया उग्र विचारधारा वालो पर कार्यवाही की गई इसके लिए आईपीसी की धारा में संसोधन किया , राजनीतिक सभा पर रोक लगा दी ,तिलक और लाला लाजपत राय को जेल भेज दिया । 

      गरम दल की विचारधारा नरमदल से विपरीत थी वे मानते थे  की ब्रिटेन और भारत के हित एक दूसरे से विपरीत है । अंग्रेजी सत्ता में सुधार संभव नही इनकी सत्ता की समाप्ति ही एकमात्र विकल्प हैं। राजनीतिक भिक्षावृत्ति के स्थान पर निष्क्रिय प्रतिरोध अर्थात बहिष्कार , स्वदेशी आंदोलन , राष्ट्रीय शिक्षा पर बल इनके प्रमुख साधन थे।  

       गरम दल ने राष्ट्रीय आन्दोलन में नई चेतना फूंक दी और जनवादी आंदोलन खड़ा किया । उन्होंने राजनीति में धर्म को समन्वित किया , इस कदम ने हिन्दुओ में इससे देशप्रेम की भावना उत्पन्न हुई परंतु इसने राष्ट्रीय आंदोलन में मुस्लिमों में उदासीनता ला दी जिसका लाभ अंग्रेजो ने उठाया और मुस्लिमों को भड़काया की कॉंग्रेस का उद्देश्य विशुद्ध हिन्दू राष्ट्र का स्थापना है और कुछ नही । 

     इसी समय मुस्लिम लीग का गठन हुआ और मुस्लिमों की अलग धारा में राजनीति की शुरुआत हुई अंग्रेजो ने तुष्टिकरण की राजनीति की शुरुआत की और 1909 में मार्ले मिंटो सुधार की घोषणा हुई जिसमें पृथक निर्वाचन जैसे विवादित प्रावधान थे और इस घोषणा से स्वतंत्रता आंदोलन की धार को कम करने का प्रयास किया गया ।  

        









Thursday, October 29, 2020

भारत का स्वतंत्रता आंदोलन पर विचार

      
        26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतंत्र बना इसके पहले भारत का विस्तृत इतिहास है यहां के लोंगो ने इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ी । 16 वी सदी के प्रारम्भ में अंग्रेजो ने यहां व्यापारिक कोठी लगाना आरम्भ किया और धीरे- धीरे सम्पूर्ण भारत को अपने अधिपत्य में ले लिया । स्वतंत्रता आंदोलन का  प्रारंभ 1857 के क्रांति से माना जाता है जब स्थानीय राजवंश अंग्रेजो के खिलाफ खड़े हुए और युध्द का बिगुल बजा दिया । 

              1857 की क्रांति असफल जरूर रही लेकिन इसने भारतीयों  में यह विश्वास उत्पन्न कर दिया कि अंग्रेजो को यहां से खदेड़ना संभव है । यहां से नवीन राष्ट्रवाद का उदय हुआ और भारतीयों में राजनीतिक एकता स्थापित हुई । राजनीतिक एकता स्थापित करने में अंग्रेजो की दी हुए पाश्चात्य शिक्षा  और परिवहन साधनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा ।  

           बिंदुवार हम समझते है कैसे देश एकजुट हुआ और राष्ट्रीय आंदोलन को गति मिली । 

1) धार्मिक सामाजिक सुधार - तात्कालिक बुद्धिजीवी और विद्वान दयानंद सरस्वती , विवेकानन्द , राजाराम मोहनराय 
 आदि ने भारतियों में स्वराज्य की भावना जागृत की , थियोसोफिकल सोसायटी का भी इसमे योगदान था । इन्होंने भारतीयों से आह्वान किया  की भारत भारतीयों के लिए है । 

2) पाश्चात्य शिक्षा - इससे समाजवाद , व्यक्तिगत स्वतंत्रता ,उदारवाद , , स्वशासन के विचार प्रबल हुए और राष्ट्रीयता की भावना जागृत हुई । 

3) समाचार पत्र एवं साहित्य- इस समय के साहित्य और समाचार पत्र ने अंग्रेज शासन के दोषपूर्ण नीति को उजागर किया तथा ऐतिहासिक अनुसंधान को पत्रिका आदि में जगह  दी इससे भारतीयों में अपने इतिहास और संस्कृति के प्रति गर्व की भावना उतपन्न हुआ और स्वशासन की प्रेरणा मिली । 

4) आर्थिक असन्तोष - अंग्रेजो की मुक्त व्यापार की नीति से भारतीय कुटीर और गृह उद्योग तबाह हुए उसका स्थान ब्रिटेन के कारखाने में बने सामग्री ने ले ली इससे धन का बहिर्गमन हुआ और भारत मे आर्थिक विपन्नता का चक्र चला , 16वीं सदी जहां विश्व जीडीपी में भारत का हिस्सा 25 % था वो 20 वी शताब्दी में मात्र 4 % रह गयी इतना जबरदस्त आर्थिक शोषण भारत का हुआ । 

5) शिक्षित भारतीयों में असन्तोष - पाश्चात्य शिक्षा पाकर जो बड़े हुए उनका विदेश जाना संभव हुआ जहां वे विश्व राजनीति 
से परिचित हुए । इन पढ़े लिखे भारतीयों को उच्च पदों का न मिलना और सिविल सर्विस परीक्षा का इंग्लैण्ड में होना , परीक्षा की आयु में कमी करना अंग्रेजो के ऐसे कदम थे जिससे शिक्षित भारतीयों में असन्तोष फैला । 

6) रंगभेद की नीति - ये सत्य था कि अंग्रेज अधिकारी गैर अंग्रेज अधिकारी से समान व्यवहार नहीं करते थे वे स्वयं को महान और दूसरों को तुच्छ समझते है इससे पढ़े लिखे जनता का विश्वास अंग्रेजो से उठा । 

7) अंग्रेजो की नीति और विदेशी आंदोलन का प्रभाव - प्रेस पर निर्बंधन , भारतीय शस्त्र अधिनियम  और अकाल के समय मे दिल्ली दरबार का आयोजन का भारतीय जनमानस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा साथ ही विदेशों में चल रहे आन्दोलन से भारतीयों ने सीख ली। 
      
     इसके आलावा इल्बर्ट बिल विवाद , लिटन और कर्जन जैसे गवर्नर जनरल का प्रतिक्रियावादी नीति ऐसे कारक थे जिसने भारतीयों को स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु प्रेरित किया और वे स्वशासन स्थापित  करने की ओर आंदोलित हुए इसी क्रम में विभिन्न संगठनों की स्थापना हुई जिसमें  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया । 


Tuesday, October 27, 2020

सतर्क भारत- समृद्ध भारत के तहत भ्रष्टाचार निवारण

        
         प्राचीन काल मे भारत सोने की चिड़िया कहलाती थी यही कारण है इसकी समृद्धि और वैभव के कारण अरब और यूरोपीय भारत के तरफ आकर्षित हुए , ब्रिटेन के अर्थशास्त्रियों के एक समूह के अनुसार 1700 ईसवी में विश्व जीडीपी में भारत का हिस्सा 25  % था जो सन 1950 में 4 % हो गया इस बात का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है की भारत का कितना जबरदस्त औपनिवेशिक शोषण हुआ और इसके जड़ में बड़ा कारण है 'भ्रष्ट व्यवस्था' । 
   
           भ्रष्टाचार का तात्पर्य भ्रष्ट आचरण से है जब व्यक्ति के नैतिकता का ह्रास हो जाता है उसके  सामाजिक मूल्य समाप्त हो जाते है, समाज और वैध संगठनों का उस पर नियंत्रण नही रहता है या उसका भय समाप्त हो जाता है तो व्यक्ति का आचरण भ्रष्ट हो जाता है । भ्रष्टाचार स्वयं एक बड़ी समस्या है साथ ही यह अनेक सामाजिक,  आर्थिक , राजनैतिक समस्याओ को जन्म देता है। इसके  निवारण के बिना समाज का उत्थान संभव नही है । 

    भारत मे भ्रष्टाचार का कारण  स्वार्थपरक राजनीति , शिक्षा का अभाव , नियम कानूनों की जटिलता , भौतिकतावादी सोच , बेरोजगारी और गरीबी के साथ- साथ कठोर कानून का अभाव , एक बड़ा कारण सामाजिक मान्यता भी है , भारतीय समाज में भ्रष्ट व्यक्ति के लिए किसी भी प्रकार का सामाजिक दंड या बहिष्कार की विधि नहीं है यह सिर्फ शासन तक सीमित है । 
          
               परिणामतः ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार  भ्रष्टाचार में भारत का स्थान 180 देशो की सूची में 80 वे  नम्बर पर है । भारत में आय की व्यापक विविधता , भुखमरी , कृषको की आत्महत्या , प्रतिभाओ का पलायन , जैसी समस्या भ्रष्टाचार का ही परिणाम है इसके साथ बेरोजगारी और गरीबी व्यापक स्तर पर विद्यमान है ।
           
        भारत को समृद्ध बनाने के लिए भ्रष्टाचार का निवारण अत्यंत आवश्यक है , स्वतंत्रता के बाद सरकार और सिविल सोसायटी ने प्रयास भी किये कानून का निर्माण , सतर्कता आयोग की नियुक्ति , सीबीआई , ईडी जैसे संगठन कालांतर में सूचना का अधिकार अधिनियम , व्हिसल ब्लोअर को सुरक्षा ,  लोकपाल बिल , और राज्यो में लोकायुक्त की नियुक्त के साथ साथ प्रशासन में इंटरनेट के उपयोग को बढ़ावा देना , आदि उपाय किये है । 
         
          उक्त प्रावधानों और संगठनों के अलावा सिविल सोसायटी की सतर्कता और शिक्षित होना आवश्यक है साथ ही भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाली मीडिया संस्थानों तथा निजी व्यक्तिओ को प्रोत्साहित करना व उनको सुरक्षा देना आवश्यक है  । चुनाव में खर्च की सीमा , और न्यायपालिका की  मजबूती , जनहित याचिका ऐसे कदम है जिससे देश भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार कर रहा है ।
     
         उपर्युक्त कदम इस भ्रष्टाचार रूपी दानव की समाप्ति  लिए नाकाफी सिद्ध हो रहे है भ्रष्टाचार के नित नए मामले  
 समाज के लिए नासूर घाव की तरह है जो धीरे धीरे सम्पूर्ण समाज को प्रभावित कर रहा है । जब तक व्यक्ति अपनी स्वार्थ को राष्ट्रीय हित से ऊपर नही रखेगा , नैतिकता का ह्रास को नही रोकेगा समाज गर्त में जायेगा । इसलिए अच्छी नियत के साथ नागरिक समाज ही सतर्क होकर समृद्ध भारत का निर्माण कर सकता है । 




Sunday, October 18, 2020

Labour low

 श्रम कानून में संशोधन -- चर्चा में 


      हाल में 22 सितंबर 2020 को संसद में पास श्रम कानून चर्चा में है सरकार इसे बड़ा सुधार कह रही है वही विपक्ष इसके विरोध में है । श्रम कानूनों में हुए संसोधन को विस्तार से सरल भाषा मे समझना आवश्यक है 

        आसान भाषा मे कहे तो 29 श्रम कानूनों को समाहित कर 4 श्रम संहिता में तब्दील कर दिया गया है ताकि इसे लागू करने में आसानी हो साथ ही विवादों को शीघ्र सुलझा लिया  जाए  संसोधन के प्रमुख बिन्दु इस प्रकार है -- 


1) अन्य राज्यो से आये श्रमिक जिसका वेतन 18000 से कम है उन्हें भी प्रवासी कामगार के श्रेणी में लाया गया है अर्थात उन्हें सभी सुविधा मिलेगी जो प्रवासी श्रमिको के लिए कानून में है । 


2) ठेकेदार अब 50 श्रमिक एक साथ नियोजित  कर सकता है पहले ये सीमा 20 थी इससे संगठित रोजगार का विस्तार होगा 


3) छोटे मोटे कार्य करने वाले श्रमिक जिनकी कभी  कभी आवश्यकता पड़ती है उन्हें भी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया गया है अर्थात अब 90 % श्रमिक को संगठित क्षेत्र में लाया लाया जाएगा और उद्यम को अपना कुल टर्न ओवर का 1 से 2 प्रतिशत सामाजिक सुरक्षा के लिए रखना होगा । पृथक  "राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड " का गठन किया जाएगा ।      


4) श्रमिक संगठन को  वैध हड़ताल  या धरना के 60 दिवस पूर्व सूचना देनी पड़ेगी या किसी ट्रिब्यूनल में विवाद चल रहा है उसके फैसले के 60 दिन बाद ही हड़ताल या धरना दे सकती है इसे सभी क्षेत्र में लागू कर दिया गया है । अर्थात उन्हें धरना या प्रदर्शन के लिए हतोत्साहित करना । 



5 ) किसी कंपनी या  उद्योग की" हायर और फायर" पॉलिसी में बदलाव अर्थात पूर्व मे जिस कंपनी में 100 से कम लेबर थे वो उन्हें निकाल सकते थे और कंपनी बंद कर सकते थे इसके लिए सरकार की अनुमति की आवश्यता नहीं होती थी जिसे बढ़ाकर 300 कर दिया दिया गया है अर्थात ऐसे उद्यम  जहां 300 से कम कर्मचारी है उन्हें रखना है या बाहर करना है कंपनी के हाथ मे है सरकारी अनुमोदन की जरूरत नही होगी । 

   

        सरकार इस बदलाव से रोजगार और मजदूरों के अधिकारों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास की है लेकिन  चौथा और पांचवा बिन्दु  ही विवाद का कारण है लेबर संगठनों को इसी बिन्दु से आपत्ति है।  उनका कथन  है इससे कंपनियां मनमानी करेगी और श्रमिक के अधिकारों को नुकसान होगा । श्रमिक अपने अधिकार के लिए आसानी से धरना नहीं दे सकते और कंपनी उसे आसानी से नियोजन से अलग कर सकती है ये श्रमिक अधिकारों के खिलाफ है । 

       दूसरी ओर देखे तो ये अर्थव्यवस्था के पहलू से सकारात्मक और उत्पादकता  बढ़ाने वाला है  16 राज्यो द्वारा पूर्व में ऐसे कदम उठाए गए है । आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 में उल्लेखित है जिस राज्य में श्रम कानून को अधिक लचीला बनाया गया है वहा उत्पादकता में 25 % की बढ़ोतरी देखी गयी है । राजस्थान राज्य इसके उदाहरण है वहा ऐसे नियम पूर्व से है । संसद की स्थायी समिति ने इन बदलावों की सिफारिश की है । 

        तमाम विपक्षी दलों के साथ राजग के मजदूर संगठन भी इसके पक्ष में नही  है और इसे लेकर लामबंद है  । एक्सपर्ट और सरकार की दलील  है कि इससे कंपनी अधिक से अधिक लोंगो को रोजगार देगी। पहले 100 लोंगो के नियोजन की बाध्यता के कारण कंपनियां जानबुचकर  अधिक लोंगो को नियोजित नही करती थी और विस्तार नहीं करती थी । छोटे छोटे कंपनी स्थापित होते थे । लेबर संगठन के धरना आदि से फैक्टरी की उत्पादकता में प्रभाव पड़ता था और उद्यमी कंपनी लगाने में रुचि नहीं रखते थे । 

       इन समस्याओं को दूर करने तथा अर्थव्यस्था गति लाने तथा आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक कदम माना जा रहा है इन सबके के बावजूद भारत जैसे लोकतांत्रिक देश मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार की सुरक्षा सर्वोपरि है । समाजिक सुरक्षा जैसे कदम स्वागतयोग्य है लेकिन किसी श्रमिक के साथ अन्याय न हो यह भी सुनिश्चित करना सरकार का प्राथमिक दायित्व है ।