स्वतंत्रता आंदोलन में 1918 से 1947 का दौर गांधी युग कहलाता है । इस समय आंदोलन का नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया था । वे इससे पहले दक्षिण अफ़्रीका में सत्याग्रह का सफल प्रयोग अंग्रेजो के खिलाफ कर चुके थे गांधी जी 1915 मे भारत आये और चम्पारण्य, खेड़ा व अहमदाबाद में सत्याग्रह का सफलतापूर्वक नेतृत्व किये । गांधी जी का स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश अंग्रेजो के सहयोगी के रूप में हुआ था उन्हें अंग्रेजो की न्यायप्रियता में विश्वास था और प्रथम विश्व युध्द में उन्हें सहायता देने की अपील भी की थी ।
अंग्रेजो द्वारा मार्च 1919 में लाया गया रौलेट एक्ट और फिर 13 अप्रैल 1919 में घटित जलियांवाला बाग हत्याकांड ऐसी घटनाएं थी जिसने देश को झकझोर दिया और इन्ही घटना के परिणामस्वरूप गांधी जी अंग्रेजो के सहयोगी से विरोधी हो गए । इसी समय खिलाफत आंदोलन हुआ जो टर्की में खलीफा के पद की बहाली के लिए मुस्लिमों का आंदोलन था जिसमें गांधी जी ने अपने समर्थन दिए और स्वतंत्रता आंदोलन में हिन्दू मुस्लिम एकता पर बल दिया ।
इन्ही परिस्थितियों में गांधी जी कांग्रेस के नागपुर सम्मेलन से शांतिपूर्ण , अहिसंक असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पास कराने में सफल हुए और कार्यक्रम की रूपरेखा तय की गई । असहयोग आंदोलन में दो पक्ष थे -
* प्रथम निषेधात्मक कार्यक्रम जिसमें ब्रिटिश राजनीतिक , सामाजिक , आर्थिक संस्थाओ का बहिष्कार करना और पूरी सरकारी मशीनरी को ठप्प करना था ।
* दूसरा रचनात्मक कार्यक्रम जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय स्कूल की स्थापना , राष्ट्रीय पंचायत का गठन , स्वदेशी अपनाना , हथकरघा ,कुटीर उद्योग को महत्व और अस्पृश्यता का अंत ।
आंदोलन प्रारम्भ होते ही महत्वपूर्ण नेताओ ने अपनी उपाधियां त्याग दी , अनेको ने सरकारी नौकरी का परित्याग किया विद्यार्थियों ने शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार किया । हिन्दू मुस्लिम एकता इस आंदोलन की विशेष बात थी ।
1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन का विरोध और बहिष्कार किया गया ।अंग्रेज अधिकारियों ने तीव्र दमन चक्र चलाया , महत्वपूर्ण नेताओ को गिरफ्तार कर लिया । गांधी जी ने वायसराय को चेतावनी दी की सरकार ने दमन नीति में परिवर्तन नहीं कि तो आंदोलन और तेज किया जाएगा जिसमें 'कर न दो' कार्यक्रम शामिल होगा ।
5 फरवरी 1922 को उत्तरप्रदेश के चौरीचौरा नामक स्थान पर उग्र भीड़ ने थाने में आग दी जिसमे 21 पुलिसवाले मारे गए । गांधी जी आंदोलन को उग्र होता देख आनन फानन में 11 फरवरी 1922 को आंदोलन वापसी की घोषणा कर दी । भारतीय जनता में आंदोलन वापसी से निराशा की लहर दौड़ गयी सुभाषचंद्र बोस , मोतीलाल नेहरू , लाला लाजपत राय के मना करने के बाद भी गांधी जी नही माना । उन्हें तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा और जनता इसे राष्ट्रीय अपमान समझी ।
इस आंदोलन को देश का प्रथम जनांदोलन कहा जाता है इस आंदोलन से लोंगो में त्याग और साहस की भावना का संचार हुआ जनता में निर्भीकता आ गयी और अब वह विद्रोह करने से नही डर रही थी इसके अलावा रचनात्मक कार्यक्रम खादी , चरखा स्वदेशी का देश को बड़ा लाभ हुआ ।
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