Friday, October 30, 2020

स्वतन्त्रता आंदोलन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

        स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक महत्वपूर्ण संगठन के रूप में उभरा 1885 में अपनी स्थापना के 21 वर्ष बाद 1907 में यह दो भागों में बंट गयी जिन्हें क्रमशः नरम व गरम दल कहा गया । 

     1885 से 1905 तक का समय उदार या नरम राष्ट्रीयता का काल कहलाता है इसमें कॉंग्रेस में उदार नेतृत्व का प्रभाव था ये क्रमिक सुधार में विश्वास करते थे इन्हें अंग्रेजो की न्यायप्रियता में विश्वास था ये ब्रिटेन के साथ सम्बन्ध भारत के हित में समझते थे । इनकी कार्यपद्धति प्रार्थना पत्र, स्मरण पत्र और प्रतिनिधि मंडल वाली थी ये सीधे आंदोलन के विरोधी थे। इनकी दुर्बलताएं यह थी कि इनकी पद्धति लोकप्रिय नही थी और न ही ये जननेता बन पाए  । देशभक्त तो थे लेकिन ये ब्रिटेन के प्रति राजभक्ति भी रखते थे जो परस्पर विरोधी स्वभाव  का है  । 

        उदारवादियों की कुछ सफलता भी रही उन्होंने ब्रिटिश शासन का दोष स्पष्ट किया भारतीयों में राजनीतिक शिक्षा की अलख जगायी और स्वतंत्रता आंदोलन का आधार तैयार किया इसलिए उन्हें भारतीय राष्ट्रीयता का जनक भी कहते है । ब्रिटिश सरकार ने भारतीय परिषद अधिनियम 1892 पारित की जो इन्ही के आवाज उठाने के परिणामस्वरूप थी । 

           1906 से 1919 कांग्रेस का उग्र राष्ट्रीयता का काल कहलाता है जिसमे लाल- बाल -पाल अर्थात लाला लाजपत राय , बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल की प्रमुख भूमिका रही । इनकी लोकप्रिय होने के प्रमुख कारण थे उदारवादियों की अनुनय विनय की नीति की असफलता तथा धार्मिक पुनरुत्थान वाद , विदेशो में भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार, पश्चिमी क्रांतिकारी विचारों का प्रभाव , महामारी के समय अंग्रेज अधिकारियों की उदासीनता , लार्ड कर्जन की प्रतिक्रियावादी नीति । उपर्युक्त कारण के आलावा 1892 के अधिनियम की लचर व्यवस्था से गरम दल का वर्चस्व बढा । 

       1907 में कांग्रेस में फूट पड़ गयी अग्रेजो ने इसका लाभ उठाया उग्र विचारधारा वालो पर कार्यवाही की गई इसके लिए आईपीसी की धारा में संसोधन किया , राजनीतिक सभा पर रोक लगा दी ,तिलक और लाला लाजपत राय को जेल भेज दिया । 

      गरम दल की विचारधारा नरमदल से विपरीत थी वे मानते थे  की ब्रिटेन और भारत के हित एक दूसरे से विपरीत है । अंग्रेजी सत्ता में सुधार संभव नही इनकी सत्ता की समाप्ति ही एकमात्र विकल्प हैं। राजनीतिक भिक्षावृत्ति के स्थान पर निष्क्रिय प्रतिरोध अर्थात बहिष्कार , स्वदेशी आंदोलन , राष्ट्रीय शिक्षा पर बल इनके प्रमुख साधन थे।  

       गरम दल ने राष्ट्रीय आन्दोलन में नई चेतना फूंक दी और जनवादी आंदोलन खड़ा किया । उन्होंने राजनीति में धर्म को समन्वित किया , इस कदम ने हिन्दुओ में इससे देशप्रेम की भावना उत्पन्न हुई परंतु इसने राष्ट्रीय आंदोलन में मुस्लिमों में उदासीनता ला दी जिसका लाभ अंग्रेजो ने उठाया और मुस्लिमों को भड़काया की कॉंग्रेस का उद्देश्य विशुद्ध हिन्दू राष्ट्र का स्थापना है और कुछ नही । 

     इसी समय मुस्लिम लीग का गठन हुआ और मुस्लिमों की अलग धारा में राजनीति की शुरुआत हुई अंग्रेजो ने तुष्टिकरण की राजनीति की शुरुआत की और 1909 में मार्ले मिंटो सुधार की घोषणा हुई जिसमें पृथक निर्वाचन जैसे विवादित प्रावधान थे और इस घोषणा से स्वतंत्रता आंदोलन की धार को कम करने का प्रयास किया गया ।  

        









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