बीते दिनों फ्रांस में एक शिक्षक द्वारा पैगम्बर हजरत मोहम्मद के विवादित कार्टून दिखाए जाने से उसकी गला रेतकर हत्या एक कट्टर मुस्लिम युवक द्वारा कर दी गयी। वहां की सरकार ने विवादित कार्टून दिखाए जाने को लेकर शिक्षक का समर्थन किया और अपनी अभिव्यक्ति के आजादी की सुरक्षा को लेकर आतंकवाद का कड़े शब्दों में निंदा की । यह कार्टून फ्रांस की प्रसिद्ध मैगजीन 'शार्ली हेब्दो' के थे जिसे लेकर पूर्व में विवाद हो चुका है ।
फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल मैक्रो ने इसे कट्टर इस्लामी आतंकवाद का हमला कहा और उन्होंने इस्लाम को संकट में बता दिया ,इस्लामी चरमपंथी से निपटने में कठोर कार्यवाही की बात कही । उनके इस बयान से समस्त मुस्लिम देश और विश्व के मुस्लिम विरोध में उतर आए और विभिन्न तरीकों से विरोध दर्ज कराया । तुर्की और पाकिस्तान इसमें सबसे अगुवा रहे । तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयब एर्दोगन ने फ्रांस के राष्ट्रप्रमुख को मानसिक इलाज करवाने की सलाह दे दी और फ्रांस के समान का बहिष्कार का आह्वान किया और यही हाल पाकिस्तान का भी था । पाक ने संसद से एक प्रस्ताव पास कर फ्रांस से अपने राजदूत को वापस बुलाने का कदम उठाया बाद में पता चला की उनका फ्रांस में कोई राजदूत ही नही हैं । मलेशिया के 95 साल के पूर्व राष्ट्रपति महातिर मोहम्मद ने तो सारी हदें पार कर दी और इस हमले को जायज ठहराया। सऊदी अरब , ईरान , कतर आदि इस्लामिक राष्ट्र ने फ्रांस के समान का बहिष्कार कर विरोध प्रकट किया।
इसी बीच फ्रांस में लगातार और भी आतंकवादी हमले हुए , चर्च में तीन बेकसूर लोंगो की गला रेतकर हत्या कर दी गयी । सउदी अरब में फ्रांस के उच्चायुक्त कार्यालय के बाहर गार्ड पर चाकू से हमला कर दिया गया ।
विदित है कि फ्रांस की कुल आबादी का 9 प्रतिशत मुस्लिम है और ज्यादातर मुस्लिम शरणार्थी के रूप में फ्रांस में आये है । फ्रांस एक ऐसा राष्ट्र है जो धर्मनिरपेक्षता को केंद्र में रख अभिव्यक्ति की आजादी , समानता , और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वाधिक महत्व देता है । धर्मविहीन राज्य ही फ्रांस के राष्ट्रधर्म है और वहां ' लैसीते ' की अवधारणा प्रचलित है जिसका अर्थ है आम आदमी या जो पादरी नहीं है । इसका मतलब है कि व्यक्ति को मजहबी स्वतंत्रता होगी लेकिन वह कानून के दायरे में होगी कानून से बड़ा कोई नहीं है। फ्रांस ने पहले ही सार्वजनिक स्थल पर धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल पर रोक लगा दिया है । एक अनुमान के मुताबित फ्रांस में 1950 तक धर्म से मुक्त लोंगो की संख्या धर्म पालन करने वालो से अधिक होगी और यही फ्रांस की राष्ट्रीय पहचान है । उनका मानना है कि फ्रांस में रहना है तो इन नियमो का पालन करना होगा ।
यहां यह बात जानना जरूरी है की फ्रांस को विश्व मे अगर कोई देश का मजबूती से साथ मिला तो वह भारत है । भारत के विदेश मंत्रालय ने बकायदा एक सर्कुलर जारी करते हुए आतंकवादी हमले की निंदा की और इससे निपटने में फ्रांस के साथ देने के बात दोहराई । भारत और फ्रांस के वैदेशिक संबंध मजबूत है और विभिन्न समय पर फ्रांस ने भारत की मदद की है इसलिए भारत को ऐसा करना जरूरी भी था । भारत और फ्रांस में कई बातों को लेकर समानता है जैसे मुस्लिम दोनो जगह अल्पसंख्यक है ,दोनो लोकतंत्र है और समानता ,स्वतंत्रता और बंधुत्व दोनो के राजकीय आदर्श है , दोनो देश कई बार आतंकवादी हमलों से आहत हुए है ।
यहाँ एक बात महत्वपूर्ण है कि धर्मनिरपेक्षता को लेकर दोनों के विचार में मामूली अंतर है जहाँ फ्रांस राज्य और व्यक्ति को धर्म से मुक्ति का पक्षधर है वही भारत सभी धर्मों को राज्य से पृथक तो करता है परंतु अबाध रूप से मानने की स्वतंत्रता भी देता है .। भारत के संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों का हिस्सा है ।
यह गौर करने वाली बात है कि अधिकतर मुस्लिम देश में लोकतंत्र नहीं है या है भी तो सिर्फ नाममात्र और स्वयं जिस देश मे मुस्लिम आबादी अधिक है वहां धर्मनिरपेक्षता सिर्फ एक जुमला है इसका उदाहरण हम पाकिस्तान , बांग्लादेश या अफगानिस्तान में देख ही रहे है कि कैसे वहां अल्पसंख्यक पर लगातार हमले हुए है और उनको कोई विशेषाधिकार नहीं है इसके विपरीत भारत में सभी धर्म के लोग आपसी सद्भाव और बंधुत्व से रहते है साथ अल्पसंख्यकों में लिए विभिन्न योजनाएं भी लागू है । भारत में मुस्लिमो की जनसंख्या लगभग 17 करोड़ से अधिक है और हिन्दू धर्म के बाद सर्वाधिक माने जाने वाला धर्म है ।
अरब के बहुत देश मे धर्म को लेकर या अन्य किसी कारण से गृह युद्ध चल रहा है और आये दिन सत्ता संघर्ष या चरमपंथी हमले में कई लोग अपना जान गवां देते है इसके कारण बड़ी मात्रा में पलायन यहां से यूरोप के देशों में हुआ है और लगातार जारी है । शरणार्थी समस्या एक बड़ी समस्या विश्व के देशों में रही है । रोहिंग्या संकट हमारे सामने है । रोहिंग्याओ को किसी भी देश ने शरण देने से साफ मना कर दिया और वे स्टेटलेस हो गए वे विभिन्न शरणार्थी कैम्पों में रहने को अभिशप्त है ।
विभिन्न देश जो स्वयं को मुस्लिम राष्ट्र घोषित कर चुके है वहां ' ईशनिंदा' से सम्बंधित कानून है अर्थात वहां ईश्वर की आलोचना करना या उनके बारे में अपशब्द कहने पर मृत्यु से लेकर आजीवन कारावास की सजा है । इस संबंध में एक अध्ययन के मुताबिक जहाँ ईशनिंदा कानून है वहां धार्मिक हिंसा और धर्म परिवर्तन की घटना अधिक देखी गयी है । एक संबंध में दोहरा रवैया भी देखने को मिलता है जब पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देश चीन में हो रहे उइगूर मुस्लिमों पर अत्याचार की घटना पर चुप रहते है और दूसरे देशों को इस पर घेरने से नही चूकते ।
पूरी विश्व जहां भूमंडलीकरण के कारण एक हो रही है वहां ऐसे धार्मिक झगड़े और कट्टरता से विश्व समुदाय को नुकसान ही है । विभिन्न मतों का सम्मान और उपहास व्यक्तिगत मामला हो सकता है लेकिन उसे समुदाय विशेष से जोड़ना और ध्रुवीकरण करना धार्मिक उन्माद ही पैदा करेगा, जहाँ आवश्यकता है संस्कृतिकरण और आपसी सद्भाव का वहां किसी भी धर्म को "सामी धर्म " होना समस्या ही उत्पन्न करेगा ।
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