श्रम कानून में संशोधन -- चर्चा में
हाल में 22 सितंबर 2020 को संसद में पास श्रम कानून चर्चा में है सरकार इसे बड़ा सुधार कह रही है वही विपक्ष इसके विरोध में है । श्रम कानूनों में हुए संसोधन को विस्तार से सरल भाषा मे समझना आवश्यक है
आसान भाषा मे कहे तो 29 श्रम कानूनों को समाहित कर 4 श्रम संहिता में तब्दील कर दिया गया है ताकि इसे लागू करने में आसानी हो साथ ही विवादों को शीघ्र सुलझा लिया जाए संसोधन के प्रमुख बिन्दु इस प्रकार है --
1) अन्य राज्यो से आये श्रमिक जिसका वेतन 18000 से कम है उन्हें भी प्रवासी कामगार के श्रेणी में लाया गया है अर्थात उन्हें सभी सुविधा मिलेगी जो प्रवासी श्रमिको के लिए कानून में है ।
2) ठेकेदार अब 50 श्रमिक एक साथ नियोजित कर सकता है पहले ये सीमा 20 थी इससे संगठित रोजगार का विस्तार होगा
3) छोटे मोटे कार्य करने वाले श्रमिक जिनकी कभी कभी आवश्यकता पड़ती है उन्हें भी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया गया है अर्थात अब 90 % श्रमिक को संगठित क्षेत्र में लाया लाया जाएगा और उद्यम को अपना कुल टर्न ओवर का 1 से 2 प्रतिशत सामाजिक सुरक्षा के लिए रखना होगा । पृथक "राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड " का गठन किया जाएगा ।
4) श्रमिक संगठन को वैध हड़ताल या धरना के 60 दिवस पूर्व सूचना देनी पड़ेगी या किसी ट्रिब्यूनल में विवाद चल रहा है उसके फैसले के 60 दिन बाद ही हड़ताल या धरना दे सकती है इसे सभी क्षेत्र में लागू कर दिया गया है । अर्थात उन्हें धरना या प्रदर्शन के लिए हतोत्साहित करना ।
5 ) किसी कंपनी या उद्योग की" हायर और फायर" पॉलिसी में बदलाव अर्थात पूर्व मे जिस कंपनी में 100 से कम लेबर थे वो उन्हें निकाल सकते थे और कंपनी बंद कर सकते थे इसके लिए सरकार की अनुमति की आवश्यता नहीं होती थी जिसे बढ़ाकर 300 कर दिया दिया गया है अर्थात ऐसे उद्यम जहां 300 से कम कर्मचारी है उन्हें रखना है या बाहर करना है कंपनी के हाथ मे है सरकारी अनुमोदन की जरूरत नही होगी ।
सरकार इस बदलाव से रोजगार और मजदूरों के अधिकारों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास की है लेकिन चौथा और पांचवा बिन्दु ही विवाद का कारण है लेबर संगठनों को इसी बिन्दु से आपत्ति है। उनका कथन है इससे कंपनियां मनमानी करेगी और श्रमिक के अधिकारों को नुकसान होगा । श्रमिक अपने अधिकार के लिए आसानी से धरना नहीं दे सकते और कंपनी उसे आसानी से नियोजन से अलग कर सकती है ये श्रमिक अधिकारों के खिलाफ है ।
दूसरी ओर देखे तो ये अर्थव्यवस्था के पहलू से सकारात्मक और उत्पादकता बढ़ाने वाला है 16 राज्यो द्वारा पूर्व में ऐसे कदम उठाए गए है । आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 में उल्लेखित है जिस राज्य में श्रम कानून को अधिक लचीला बनाया गया है वहा उत्पादकता में 25 % की बढ़ोतरी देखी गयी है । राजस्थान राज्य इसके उदाहरण है वहा ऐसे नियम पूर्व से है । संसद की स्थायी समिति ने इन बदलावों की सिफारिश की है ।
तमाम विपक्षी दलों के साथ राजग के मजदूर संगठन भी इसके पक्ष में नही है और इसे लेकर लामबंद है । एक्सपर्ट और सरकार की दलील है कि इससे कंपनी अधिक से अधिक लोंगो को रोजगार देगी। पहले 100 लोंगो के नियोजन की बाध्यता के कारण कंपनियां जानबुचकर अधिक लोंगो को नियोजित नही करती थी और विस्तार नहीं करती थी । छोटे छोटे कंपनी स्थापित होते थे । लेबर संगठन के धरना आदि से फैक्टरी की उत्पादकता में प्रभाव पड़ता था और उद्यमी कंपनी लगाने में रुचि नहीं रखते थे ।
इन समस्याओं को दूर करने तथा अर्थव्यस्था गति लाने तथा आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक कदम माना जा रहा है इन सबके के बावजूद भारत जैसे लोकतांत्रिक देश मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार की सुरक्षा सर्वोपरि है । समाजिक सुरक्षा जैसे कदम स्वागतयोग्य है लेकिन किसी श्रमिक के साथ अन्याय न हो यह भी सुनिश्चित करना सरकार का प्राथमिक दायित्व है ।

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