Saturday, October 31, 2020

गांधी युग - स्वतंत्रता आंदोलन पार्ट-1 असहयोग आंदोलन

       स्वतंत्रता आंदोलन में 1918 से 1947 का दौर गांधी युग कहलाता है । इस समय आंदोलन का नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया था । वे इससे पहले दक्षिण अफ़्रीका में सत्याग्रह का सफल प्रयोग अंग्रेजो के खिलाफ कर चुके थे गांधी जी 1915 मे भारत आये और चम्पारण्य, खेड़ा व अहमदाबाद में सत्याग्रह का सफलतापूर्वक नेतृत्व किये । गांधी जी का स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश अंग्रेजो के सहयोगी के रूप में हुआ था उन्हें अंग्रेजो की न्यायप्रियता में विश्वास था और प्रथम विश्व युध्द में उन्हें सहायता देने की अपील  भी की थी । 

      अंग्रेजो द्वारा मार्च 1919 में लाया गया रौलेट एक्ट और फिर 13 अप्रैल 1919 में घटित जलियांवाला बाग हत्याकांड ऐसी घटनाएं थी जिसने देश को झकझोर दिया और इन्ही घटना के परिणामस्वरूप गांधी जी अंग्रेजो के सहयोगी से विरोधी हो गए । इसी समय खिलाफत आंदोलन हुआ जो टर्की में खलीफा के पद की बहाली के लिए मुस्लिमों का आंदोलन था जिसमें गांधी जी ने अपने समर्थन दिए और स्वतंत्रता आंदोलन में हिन्दू मुस्लिम एकता पर बल दिया ।  

         इन्ही परिस्थितियों में गांधी जी कांग्रेस के नागपुर सम्मेलन से शांतिपूर्ण , अहिसंक असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पास कराने में सफल हुए और कार्यक्रम की रूपरेखा तय की गई । असहयोग आंदोलन में दो पक्ष थे -

* प्रथम निषेधात्मक कार्यक्रम जिसमें  ब्रिटिश राजनीतिक , सामाजिक , आर्थिक संस्थाओ का बहिष्कार करना और पूरी सरकारी मशीनरी को ठप्प करना था ।

* दूसरा रचनात्मक कार्यक्रम जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय स्कूल की स्थापना , राष्ट्रीय पंचायत का गठन , स्वदेशी अपनाना , हथकरघा ,कुटीर उद्योग को महत्व और अस्पृश्यता का अंत । 

          आंदोलन प्रारम्भ होते ही महत्वपूर्ण नेताओ  ने अपनी उपाधियां त्याग दी , अनेको ने सरकारी नौकरी का परित्याग किया विद्यार्थियों ने शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार किया । हिन्दू मुस्लिम एकता इस आंदोलन की विशेष बात थी । 

      1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन का विरोध और बहिष्कार किया गया ।अंग्रेज अधिकारियों ने तीव्र दमन चक्र चलाया , महत्वपूर्ण नेताओ को गिरफ्तार कर लिया । गांधी जी  ने वायसराय को चेतावनी दी की सरकार ने दमन नीति में परिवर्तन नहीं कि तो आंदोलन और तेज किया जाएगा जिसमें  'कर न दो'  कार्यक्रम शामिल होगा । 

          5 फरवरी 1922 को उत्तरप्रदेश के चौरीचौरा नामक स्थान पर उग्र भीड़ ने थाने में आग दी जिसमे 21 पुलिसवाले मारे गए । गांधी जी आंदोलन को उग्र होता देख आनन फानन में 11 फरवरी 1922 को आंदोलन वापसी की घोषणा कर दी । भारतीय जनता में आंदोलन वापसी से निराशा की लहर दौड़ गयी सुभाषचंद्र बोस , मोतीलाल नेहरू , लाला लाजपत राय के मना करने के बाद भी गांधी जी नही माना । उन्हें तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा और जनता इसे राष्ट्रीय अपमान समझी । 

        इस आंदोलन को देश का प्रथम जनांदोलन कहा जाता है इस आंदोलन से लोंगो में त्याग और साहस की भावना का संचार हुआ जनता में निर्भीकता आ गयी और अब वह विद्रोह करने से नही डर रही थी इसके अलावा रचनात्मक कार्यक्रम खादी , चरखा स्वदेशी का देश को बड़ा लाभ हुआ । 

Friday, October 30, 2020

स्वतन्त्रता आंदोलन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

        स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक महत्वपूर्ण संगठन के रूप में उभरा 1885 में अपनी स्थापना के 21 वर्ष बाद 1907 में यह दो भागों में बंट गयी जिन्हें क्रमशः नरम व गरम दल कहा गया । 

     1885 से 1905 तक का समय उदार या नरम राष्ट्रीयता का काल कहलाता है इसमें कॉंग्रेस में उदार नेतृत्व का प्रभाव था ये क्रमिक सुधार में विश्वास करते थे इन्हें अंग्रेजो की न्यायप्रियता में विश्वास था ये ब्रिटेन के साथ सम्बन्ध भारत के हित में समझते थे । इनकी कार्यपद्धति प्रार्थना पत्र, स्मरण पत्र और प्रतिनिधि मंडल वाली थी ये सीधे आंदोलन के विरोधी थे। इनकी दुर्बलताएं यह थी कि इनकी पद्धति लोकप्रिय नही थी और न ही ये जननेता बन पाए  । देशभक्त तो थे लेकिन ये ब्रिटेन के प्रति राजभक्ति भी रखते थे जो परस्पर विरोधी स्वभाव  का है  । 

        उदारवादियों की कुछ सफलता भी रही उन्होंने ब्रिटिश शासन का दोष स्पष्ट किया भारतीयों में राजनीतिक शिक्षा की अलख जगायी और स्वतंत्रता आंदोलन का आधार तैयार किया इसलिए उन्हें भारतीय राष्ट्रीयता का जनक भी कहते है । ब्रिटिश सरकार ने भारतीय परिषद अधिनियम 1892 पारित की जो इन्ही के आवाज उठाने के परिणामस्वरूप थी । 

           1906 से 1919 कांग्रेस का उग्र राष्ट्रीयता का काल कहलाता है जिसमे लाल- बाल -पाल अर्थात लाला लाजपत राय , बाल गंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल की प्रमुख भूमिका रही । इनकी लोकप्रिय होने के प्रमुख कारण थे उदारवादियों की अनुनय विनय की नीति की असफलता तथा धार्मिक पुनरुत्थान वाद , विदेशो में भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार, पश्चिमी क्रांतिकारी विचारों का प्रभाव , महामारी के समय अंग्रेज अधिकारियों की उदासीनता , लार्ड कर्जन की प्रतिक्रियावादी नीति । उपर्युक्त कारण के आलावा 1892 के अधिनियम की लचर व्यवस्था से गरम दल का वर्चस्व बढा । 

       1907 में कांग्रेस में फूट पड़ गयी अग्रेजो ने इसका लाभ उठाया उग्र विचारधारा वालो पर कार्यवाही की गई इसके लिए आईपीसी की धारा में संसोधन किया , राजनीतिक सभा पर रोक लगा दी ,तिलक और लाला लाजपत राय को जेल भेज दिया । 

      गरम दल की विचारधारा नरमदल से विपरीत थी वे मानते थे  की ब्रिटेन और भारत के हित एक दूसरे से विपरीत है । अंग्रेजी सत्ता में सुधार संभव नही इनकी सत्ता की समाप्ति ही एकमात्र विकल्प हैं। राजनीतिक भिक्षावृत्ति के स्थान पर निष्क्रिय प्रतिरोध अर्थात बहिष्कार , स्वदेशी आंदोलन , राष्ट्रीय शिक्षा पर बल इनके प्रमुख साधन थे।  

       गरम दल ने राष्ट्रीय आन्दोलन में नई चेतना फूंक दी और जनवादी आंदोलन खड़ा किया । उन्होंने राजनीति में धर्म को समन्वित किया , इस कदम ने हिन्दुओ में इससे देशप्रेम की भावना उत्पन्न हुई परंतु इसने राष्ट्रीय आंदोलन में मुस्लिमों में उदासीनता ला दी जिसका लाभ अंग्रेजो ने उठाया और मुस्लिमों को भड़काया की कॉंग्रेस का उद्देश्य विशुद्ध हिन्दू राष्ट्र का स्थापना है और कुछ नही । 

     इसी समय मुस्लिम लीग का गठन हुआ और मुस्लिमों की अलग धारा में राजनीति की शुरुआत हुई अंग्रेजो ने तुष्टिकरण की राजनीति की शुरुआत की और 1909 में मार्ले मिंटो सुधार की घोषणा हुई जिसमें पृथक निर्वाचन जैसे विवादित प्रावधान थे और इस घोषणा से स्वतंत्रता आंदोलन की धार को कम करने का प्रयास किया गया ।  

        









Thursday, October 29, 2020

भारत का स्वतंत्रता आंदोलन पर विचार

      
        26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतंत्र बना इसके पहले भारत का विस्तृत इतिहास है यहां के लोंगो ने इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ी । 16 वी सदी के प्रारम्भ में अंग्रेजो ने यहां व्यापारिक कोठी लगाना आरम्भ किया और धीरे- धीरे सम्पूर्ण भारत को अपने अधिपत्य में ले लिया । स्वतंत्रता आंदोलन का  प्रारंभ 1857 के क्रांति से माना जाता है जब स्थानीय राजवंश अंग्रेजो के खिलाफ खड़े हुए और युध्द का बिगुल बजा दिया । 

              1857 की क्रांति असफल जरूर रही लेकिन इसने भारतीयों  में यह विश्वास उत्पन्न कर दिया कि अंग्रेजो को यहां से खदेड़ना संभव है । यहां से नवीन राष्ट्रवाद का उदय हुआ और भारतीयों में राजनीतिक एकता स्थापित हुई । राजनीतिक एकता स्थापित करने में अंग्रेजो की दी हुए पाश्चात्य शिक्षा  और परिवहन साधनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा ।  

           बिंदुवार हम समझते है कैसे देश एकजुट हुआ और राष्ट्रीय आंदोलन को गति मिली । 

1) धार्मिक सामाजिक सुधार - तात्कालिक बुद्धिजीवी और विद्वान दयानंद सरस्वती , विवेकानन्द , राजाराम मोहनराय 
 आदि ने भारतियों में स्वराज्य की भावना जागृत की , थियोसोफिकल सोसायटी का भी इसमे योगदान था । इन्होंने भारतीयों से आह्वान किया  की भारत भारतीयों के लिए है । 

2) पाश्चात्य शिक्षा - इससे समाजवाद , व्यक्तिगत स्वतंत्रता ,उदारवाद , , स्वशासन के विचार प्रबल हुए और राष्ट्रीयता की भावना जागृत हुई । 

3) समाचार पत्र एवं साहित्य- इस समय के साहित्य और समाचार पत्र ने अंग्रेज शासन के दोषपूर्ण नीति को उजागर किया तथा ऐतिहासिक अनुसंधान को पत्रिका आदि में जगह  दी इससे भारतीयों में अपने इतिहास और संस्कृति के प्रति गर्व की भावना उतपन्न हुआ और स्वशासन की प्रेरणा मिली । 

4) आर्थिक असन्तोष - अंग्रेजो की मुक्त व्यापार की नीति से भारतीय कुटीर और गृह उद्योग तबाह हुए उसका स्थान ब्रिटेन के कारखाने में बने सामग्री ने ले ली इससे धन का बहिर्गमन हुआ और भारत मे आर्थिक विपन्नता का चक्र चला , 16वीं सदी जहां विश्व जीडीपी में भारत का हिस्सा 25 % था वो 20 वी शताब्दी में मात्र 4 % रह गयी इतना जबरदस्त आर्थिक शोषण भारत का हुआ । 

5) शिक्षित भारतीयों में असन्तोष - पाश्चात्य शिक्षा पाकर जो बड़े हुए उनका विदेश जाना संभव हुआ जहां वे विश्व राजनीति 
से परिचित हुए । इन पढ़े लिखे भारतीयों को उच्च पदों का न मिलना और सिविल सर्विस परीक्षा का इंग्लैण्ड में होना , परीक्षा की आयु में कमी करना अंग्रेजो के ऐसे कदम थे जिससे शिक्षित भारतीयों में असन्तोष फैला । 

6) रंगभेद की नीति - ये सत्य था कि अंग्रेज अधिकारी गैर अंग्रेज अधिकारी से समान व्यवहार नहीं करते थे वे स्वयं को महान और दूसरों को तुच्छ समझते है इससे पढ़े लिखे जनता का विश्वास अंग्रेजो से उठा । 

7) अंग्रेजो की नीति और विदेशी आंदोलन का प्रभाव - प्रेस पर निर्बंधन , भारतीय शस्त्र अधिनियम  और अकाल के समय मे दिल्ली दरबार का आयोजन का भारतीय जनमानस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा साथ ही विदेशों में चल रहे आन्दोलन से भारतीयों ने सीख ली। 
      
     इसके आलावा इल्बर्ट बिल विवाद , लिटन और कर्जन जैसे गवर्नर जनरल का प्रतिक्रियावादी नीति ऐसे कारक थे जिसने भारतीयों को स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु प्रेरित किया और वे स्वशासन स्थापित  करने की ओर आंदोलित हुए इसी क्रम में विभिन्न संगठनों की स्थापना हुई जिसमें  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया । 


Tuesday, October 27, 2020

सतर्क भारत- समृद्ध भारत के तहत भ्रष्टाचार निवारण

        
         प्राचीन काल मे भारत सोने की चिड़िया कहलाती थी यही कारण है इसकी समृद्धि और वैभव के कारण अरब और यूरोपीय भारत के तरफ आकर्षित हुए , ब्रिटेन के अर्थशास्त्रियों के एक समूह के अनुसार 1700 ईसवी में विश्व जीडीपी में भारत का हिस्सा 25  % था जो सन 1950 में 4 % हो गया इस बात का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है की भारत का कितना जबरदस्त औपनिवेशिक शोषण हुआ और इसके जड़ में बड़ा कारण है 'भ्रष्ट व्यवस्था' । 
   
           भ्रष्टाचार का तात्पर्य भ्रष्ट आचरण से है जब व्यक्ति के नैतिकता का ह्रास हो जाता है उसके  सामाजिक मूल्य समाप्त हो जाते है, समाज और वैध संगठनों का उस पर नियंत्रण नही रहता है या उसका भय समाप्त हो जाता है तो व्यक्ति का आचरण भ्रष्ट हो जाता है । भ्रष्टाचार स्वयं एक बड़ी समस्या है साथ ही यह अनेक सामाजिक,  आर्थिक , राजनैतिक समस्याओ को जन्म देता है। इसके  निवारण के बिना समाज का उत्थान संभव नही है । 

    भारत मे भ्रष्टाचार का कारण  स्वार्थपरक राजनीति , शिक्षा का अभाव , नियम कानूनों की जटिलता , भौतिकतावादी सोच , बेरोजगारी और गरीबी के साथ- साथ कठोर कानून का अभाव , एक बड़ा कारण सामाजिक मान्यता भी है , भारतीय समाज में भ्रष्ट व्यक्ति के लिए किसी भी प्रकार का सामाजिक दंड या बहिष्कार की विधि नहीं है यह सिर्फ शासन तक सीमित है । 
          
               परिणामतः ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार  भ्रष्टाचार में भारत का स्थान 180 देशो की सूची में 80 वे  नम्बर पर है । भारत में आय की व्यापक विविधता , भुखमरी , कृषको की आत्महत्या , प्रतिभाओ का पलायन , जैसी समस्या भ्रष्टाचार का ही परिणाम है इसके साथ बेरोजगारी और गरीबी व्यापक स्तर पर विद्यमान है ।
           
        भारत को समृद्ध बनाने के लिए भ्रष्टाचार का निवारण अत्यंत आवश्यक है , स्वतंत्रता के बाद सरकार और सिविल सोसायटी ने प्रयास भी किये कानून का निर्माण , सतर्कता आयोग की नियुक्ति , सीबीआई , ईडी जैसे संगठन कालांतर में सूचना का अधिकार अधिनियम , व्हिसल ब्लोअर को सुरक्षा ,  लोकपाल बिल , और राज्यो में लोकायुक्त की नियुक्त के साथ साथ प्रशासन में इंटरनेट के उपयोग को बढ़ावा देना , आदि उपाय किये है । 
         
          उक्त प्रावधानों और संगठनों के अलावा सिविल सोसायटी की सतर्कता और शिक्षित होना आवश्यक है साथ ही भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाली मीडिया संस्थानों तथा निजी व्यक्तिओ को प्रोत्साहित करना व उनको सुरक्षा देना आवश्यक है  । चुनाव में खर्च की सीमा , और न्यायपालिका की  मजबूती , जनहित याचिका ऐसे कदम है जिससे देश भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार कर रहा है ।
     
         उपर्युक्त कदम इस भ्रष्टाचार रूपी दानव की समाप्ति  लिए नाकाफी सिद्ध हो रहे है भ्रष्टाचार के नित नए मामले  
 समाज के लिए नासूर घाव की तरह है जो धीरे धीरे सम्पूर्ण समाज को प्रभावित कर रहा है । जब तक व्यक्ति अपनी स्वार्थ को राष्ट्रीय हित से ऊपर नही रखेगा , नैतिकता का ह्रास को नही रोकेगा समाज गर्त में जायेगा । इसलिए अच्छी नियत के साथ नागरिक समाज ही सतर्क होकर समृद्ध भारत का निर्माण कर सकता है । 




Sunday, October 18, 2020

Labour low

 श्रम कानून में संशोधन -- चर्चा में 


      हाल में 22 सितंबर 2020 को संसद में पास श्रम कानून चर्चा में है सरकार इसे बड़ा सुधार कह रही है वही विपक्ष इसके विरोध में है । श्रम कानूनों में हुए संसोधन को विस्तार से सरल भाषा मे समझना आवश्यक है 

        आसान भाषा मे कहे तो 29 श्रम कानूनों को समाहित कर 4 श्रम संहिता में तब्दील कर दिया गया है ताकि इसे लागू करने में आसानी हो साथ ही विवादों को शीघ्र सुलझा लिया  जाए  संसोधन के प्रमुख बिन्दु इस प्रकार है -- 


1) अन्य राज्यो से आये श्रमिक जिसका वेतन 18000 से कम है उन्हें भी प्रवासी कामगार के श्रेणी में लाया गया है अर्थात उन्हें सभी सुविधा मिलेगी जो प्रवासी श्रमिको के लिए कानून में है । 


2) ठेकेदार अब 50 श्रमिक एक साथ नियोजित  कर सकता है पहले ये सीमा 20 थी इससे संगठित रोजगार का विस्तार होगा 


3) छोटे मोटे कार्य करने वाले श्रमिक जिनकी कभी  कभी आवश्यकता पड़ती है उन्हें भी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया गया है अर्थात अब 90 % श्रमिक को संगठित क्षेत्र में लाया लाया जाएगा और उद्यम को अपना कुल टर्न ओवर का 1 से 2 प्रतिशत सामाजिक सुरक्षा के लिए रखना होगा । पृथक  "राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड " का गठन किया जाएगा ।      


4) श्रमिक संगठन को  वैध हड़ताल  या धरना के 60 दिवस पूर्व सूचना देनी पड़ेगी या किसी ट्रिब्यूनल में विवाद चल रहा है उसके फैसले के 60 दिन बाद ही हड़ताल या धरना दे सकती है इसे सभी क्षेत्र में लागू कर दिया गया है । अर्थात उन्हें धरना या प्रदर्शन के लिए हतोत्साहित करना । 



5 ) किसी कंपनी या  उद्योग की" हायर और फायर" पॉलिसी में बदलाव अर्थात पूर्व मे जिस कंपनी में 100 से कम लेबर थे वो उन्हें निकाल सकते थे और कंपनी बंद कर सकते थे इसके लिए सरकार की अनुमति की आवश्यता नहीं होती थी जिसे बढ़ाकर 300 कर दिया दिया गया है अर्थात ऐसे उद्यम  जहां 300 से कम कर्मचारी है उन्हें रखना है या बाहर करना है कंपनी के हाथ मे है सरकारी अनुमोदन की जरूरत नही होगी । 

   

        सरकार इस बदलाव से रोजगार और मजदूरों के अधिकारों में संतुलन स्थापित करने का प्रयास की है लेकिन  चौथा और पांचवा बिन्दु  ही विवाद का कारण है लेबर संगठनों को इसी बिन्दु से आपत्ति है।  उनका कथन  है इससे कंपनियां मनमानी करेगी और श्रमिक के अधिकारों को नुकसान होगा । श्रमिक अपने अधिकार के लिए आसानी से धरना नहीं दे सकते और कंपनी उसे आसानी से नियोजन से अलग कर सकती है ये श्रमिक अधिकारों के खिलाफ है । 

       दूसरी ओर देखे तो ये अर्थव्यवस्था के पहलू से सकारात्मक और उत्पादकता  बढ़ाने वाला है  16 राज्यो द्वारा पूर्व में ऐसे कदम उठाए गए है । आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 में उल्लेखित है जिस राज्य में श्रम कानून को अधिक लचीला बनाया गया है वहा उत्पादकता में 25 % की बढ़ोतरी देखी गयी है । राजस्थान राज्य इसके उदाहरण है वहा ऐसे नियम पूर्व से है । संसद की स्थायी समिति ने इन बदलावों की सिफारिश की है । 

        तमाम विपक्षी दलों के साथ राजग के मजदूर संगठन भी इसके पक्ष में नही  है और इसे लेकर लामबंद है  । एक्सपर्ट और सरकार की दलील  है कि इससे कंपनी अधिक से अधिक लोंगो को रोजगार देगी। पहले 100 लोंगो के नियोजन की बाध्यता के कारण कंपनियां जानबुचकर  अधिक लोंगो को नियोजित नही करती थी और विस्तार नहीं करती थी । छोटे छोटे कंपनी स्थापित होते थे । लेबर संगठन के धरना आदि से फैक्टरी की उत्पादकता में प्रभाव पड़ता था और उद्यमी कंपनी लगाने में रुचि नहीं रखते थे । 

       इन समस्याओं को दूर करने तथा अर्थव्यस्था गति लाने तथा आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक कदम माना जा रहा है इन सबके के बावजूद भारत जैसे लोकतांत्रिक देश मे व्यक्ति के मौलिक अधिकार की सुरक्षा सर्वोपरि है । समाजिक सुरक्षा जैसे कदम स्वागतयोग्य है लेकिन किसी श्रमिक के साथ अन्याय न हो यह भी सुनिश्चित करना सरकार का प्राथमिक दायित्व है ।