Thursday, October 29, 2020

भारत का स्वतंत्रता आंदोलन पर विचार

      
        26 जनवरी 1950 को भारत एक गणतंत्र बना इसके पहले भारत का विस्तृत इतिहास है यहां के लोंगो ने इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ी । 16 वी सदी के प्रारम्भ में अंग्रेजो ने यहां व्यापारिक कोठी लगाना आरम्भ किया और धीरे- धीरे सम्पूर्ण भारत को अपने अधिपत्य में ले लिया । स्वतंत्रता आंदोलन का  प्रारंभ 1857 के क्रांति से माना जाता है जब स्थानीय राजवंश अंग्रेजो के खिलाफ खड़े हुए और युध्द का बिगुल बजा दिया । 

              1857 की क्रांति असफल जरूर रही लेकिन इसने भारतीयों  में यह विश्वास उत्पन्न कर दिया कि अंग्रेजो को यहां से खदेड़ना संभव है । यहां से नवीन राष्ट्रवाद का उदय हुआ और भारतीयों में राजनीतिक एकता स्थापित हुई । राजनीतिक एकता स्थापित करने में अंग्रेजो की दी हुए पाश्चात्य शिक्षा  और परिवहन साधनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा ।  

           बिंदुवार हम समझते है कैसे देश एकजुट हुआ और राष्ट्रीय आंदोलन को गति मिली । 

1) धार्मिक सामाजिक सुधार - तात्कालिक बुद्धिजीवी और विद्वान दयानंद सरस्वती , विवेकानन्द , राजाराम मोहनराय 
 आदि ने भारतियों में स्वराज्य की भावना जागृत की , थियोसोफिकल सोसायटी का भी इसमे योगदान था । इन्होंने भारतीयों से आह्वान किया  की भारत भारतीयों के लिए है । 

2) पाश्चात्य शिक्षा - इससे समाजवाद , व्यक्तिगत स्वतंत्रता ,उदारवाद , , स्वशासन के विचार प्रबल हुए और राष्ट्रीयता की भावना जागृत हुई । 

3) समाचार पत्र एवं साहित्य- इस समय के साहित्य और समाचार पत्र ने अंग्रेज शासन के दोषपूर्ण नीति को उजागर किया तथा ऐतिहासिक अनुसंधान को पत्रिका आदि में जगह  दी इससे भारतीयों में अपने इतिहास और संस्कृति के प्रति गर्व की भावना उतपन्न हुआ और स्वशासन की प्रेरणा मिली । 

4) आर्थिक असन्तोष - अंग्रेजो की मुक्त व्यापार की नीति से भारतीय कुटीर और गृह उद्योग तबाह हुए उसका स्थान ब्रिटेन के कारखाने में बने सामग्री ने ले ली इससे धन का बहिर्गमन हुआ और भारत मे आर्थिक विपन्नता का चक्र चला , 16वीं सदी जहां विश्व जीडीपी में भारत का हिस्सा 25 % था वो 20 वी शताब्दी में मात्र 4 % रह गयी इतना जबरदस्त आर्थिक शोषण भारत का हुआ । 

5) शिक्षित भारतीयों में असन्तोष - पाश्चात्य शिक्षा पाकर जो बड़े हुए उनका विदेश जाना संभव हुआ जहां वे विश्व राजनीति 
से परिचित हुए । इन पढ़े लिखे भारतीयों को उच्च पदों का न मिलना और सिविल सर्विस परीक्षा का इंग्लैण्ड में होना , परीक्षा की आयु में कमी करना अंग्रेजो के ऐसे कदम थे जिससे शिक्षित भारतीयों में असन्तोष फैला । 

6) रंगभेद की नीति - ये सत्य था कि अंग्रेज अधिकारी गैर अंग्रेज अधिकारी से समान व्यवहार नहीं करते थे वे स्वयं को महान और दूसरों को तुच्छ समझते है इससे पढ़े लिखे जनता का विश्वास अंग्रेजो से उठा । 

7) अंग्रेजो की नीति और विदेशी आंदोलन का प्रभाव - प्रेस पर निर्बंधन , भारतीय शस्त्र अधिनियम  और अकाल के समय मे दिल्ली दरबार का आयोजन का भारतीय जनमानस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा साथ ही विदेशों में चल रहे आन्दोलन से भारतीयों ने सीख ली। 
      
     इसके आलावा इल्बर्ट बिल विवाद , लिटन और कर्जन जैसे गवर्नर जनरल का प्रतिक्रियावादी नीति ऐसे कारक थे जिसने भारतीयों को स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु प्रेरित किया और वे स्वशासन स्थापित  करने की ओर आंदोलित हुए इसी क्रम में विभिन्न संगठनों की स्थापना हुई जिसमें  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया । 


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