प्राचीन काल मे भारत सोने की चिड़िया कहलाती थी यही कारण है इसकी समृद्धि और वैभव के कारण अरब और यूरोपीय भारत के तरफ आकर्षित हुए , ब्रिटेन के अर्थशास्त्रियों के एक समूह के अनुसार 1700 ईसवी में विश्व जीडीपी में भारत का हिस्सा 25 % था जो सन 1950 में 4 % हो गया इस बात का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है की भारत का कितना जबरदस्त औपनिवेशिक शोषण हुआ और इसके जड़ में बड़ा कारण है 'भ्रष्ट व्यवस्था' ।
भ्रष्टाचार का तात्पर्य भ्रष्ट आचरण से है जब व्यक्ति के नैतिकता का ह्रास हो जाता है उसके सामाजिक मूल्य समाप्त हो जाते है, समाज और वैध संगठनों का उस पर नियंत्रण नही रहता है या उसका भय समाप्त हो जाता है तो व्यक्ति का आचरण भ्रष्ट हो जाता है । भ्रष्टाचार स्वयं एक बड़ी समस्या है साथ ही यह अनेक सामाजिक, आर्थिक , राजनैतिक समस्याओ को जन्म देता है। इसके निवारण के बिना समाज का उत्थान संभव नही है ।
भारत मे भ्रष्टाचार का कारण स्वार्थपरक राजनीति , शिक्षा का अभाव , नियम कानूनों की जटिलता , भौतिकतावादी सोच , बेरोजगारी और गरीबी के साथ- साथ कठोर कानून का अभाव , एक बड़ा कारण सामाजिक मान्यता भी है , भारतीय समाज में भ्रष्ट व्यक्ति के लिए किसी भी प्रकार का सामाजिक दंड या बहिष्कार की विधि नहीं है यह सिर्फ शासन तक सीमित है ।
परिणामतः ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार भ्रष्टाचार में भारत का स्थान 180 देशो की सूची में 80 वे नम्बर पर है । भारत में आय की व्यापक विविधता , भुखमरी , कृषको की आत्महत्या , प्रतिभाओ का पलायन , जैसी समस्या भ्रष्टाचार का ही परिणाम है इसके साथ बेरोजगारी और गरीबी व्यापक स्तर पर विद्यमान है ।
भारत को समृद्ध बनाने के लिए भ्रष्टाचार का निवारण अत्यंत आवश्यक है , स्वतंत्रता के बाद सरकार और सिविल सोसायटी ने प्रयास भी किये कानून का निर्माण , सतर्कता आयोग की नियुक्ति , सीबीआई , ईडी जैसे संगठन कालांतर में सूचना का अधिकार अधिनियम , व्हिसल ब्लोअर को सुरक्षा , लोकपाल बिल , और राज्यो में लोकायुक्त की नियुक्त के साथ साथ प्रशासन में इंटरनेट के उपयोग को बढ़ावा देना , आदि उपाय किये है ।
उक्त प्रावधानों और संगठनों के अलावा सिविल सोसायटी की सतर्कता और शिक्षित होना आवश्यक है साथ ही भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाली मीडिया संस्थानों तथा निजी व्यक्तिओ को प्रोत्साहित करना व उनको सुरक्षा देना आवश्यक है । चुनाव में खर्च की सीमा , और न्यायपालिका की मजबूती , जनहित याचिका ऐसे कदम है जिससे देश भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार कर रहा है ।
उपर्युक्त कदम इस भ्रष्टाचार रूपी दानव की समाप्ति लिए नाकाफी सिद्ध हो रहे है भ्रष्टाचार के नित नए मामले
समाज के लिए नासूर घाव की तरह है जो धीरे धीरे सम्पूर्ण समाज को प्रभावित कर रहा है । जब तक व्यक्ति अपनी स्वार्थ को राष्ट्रीय हित से ऊपर नही रखेगा , नैतिकता का ह्रास को नही रोकेगा समाज गर्त में जायेगा । इसलिए अच्छी नियत के साथ नागरिक समाज ही सतर्क होकर समृद्ध भारत का निर्माण कर सकता है ।
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