Monday, November 30, 2020
छत्तीसगढ़ राज्य सेवा परीक्षा - प्रारंभिक परीक्षा का मूल्यांकन
Friday, November 13, 2020
नए कृषि कानून और विवाद
17 सितंबर को लोकसभा में पास कृषि सुधार के तीन बिलो को लेकर कई राज्यों के किसान सड़क पर है । विपक्ष के सभी दल विरोध कर रहे है साथ ही सरकार की सहयोगी अकाली दल भी किसानों के साथ खड़ी है और विरोध कर रही है ।
विरोध का मुख्य कारण तीनो बिलो में किये प्रावधानों को लेकर है जो निम्न है -
1) किसान अपना उपज स्थानीय विपणन समिति के अलावा कही भी विक्रय कर सकता है । न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार खत्म नहीं करेगी और सरकारी खरीद भी जारी रहेगी ।
2) आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव से अब स्टॉक की अधिकतम सीमा हटा दी गयी है अर्थात व्यापारी अब कितना भी समान अपने गोदामो में रख सकता है ।
3) अब किसान अपनी जमीन ठेका पर दे सकता है अर्थात ठेका कृषि को प्रोत्साहन।
उपरोक्त प्रावधानों के विरोध का मुख्य कारण और इस पर किसान संगठनों की राय है --
1) सरकार जब अभी MSP नही दिला पा रही है तो निजी खरीद प्रक्रिया से तो और संभव नही है। इससे किसान का माल और कम मूल्य में खरीदा जाएगा ।
2 ) स्टॉक की सीमा तय नहीं होने से कालाबाजारी बढ़ेगा और व्यापारी गोदामो में अधिक माल को रख सकेंगे ।
3) ठेका पर खेती होने से सरकार सब्सिडी खत्म कर देगी और मुआवजा आदि भी खत्म हो जाएगा किसान से जमीन छिन जागेगी और कृषक ,मजदूर बन जाएंगे ।
सरकार का मत है इस बिल से किसानों फायदा होगा और ये क्रांतिकारी परिवर्तन है ।
1) सरकार बाजार में प्रतियोगिता को बढ़ावा देना चाह रही है ताकि किसान के फसल का मूल्य बढ़े और कही भी बेच सके वन नेशन वन मार्किट ।
2) स्टॉक की सीमा हटने से बड़ी कंपनियां किसानों से माल खरीदेगी और गोदामो में रख सकेगी।
3) ठेका कृषि वर्तमान की जरूरत है जहाँ खेती के रकबे के कमी और चको का आकार छोटा हो रहा है वहां ठेका खेती से छोटे किसान लाभान्वित होंगे।
4) सरकार MSP खत्म नहीं करेगी जिससे मंडी में बेचना है वो बेच सकते है।
कृषि विशेषज्ञ और किसान इसे किसान विरोधी मानते है उनका कहना है इससे पहले जैसे समस्या निर्मित हो सकती है जब सेठ साहूकार कम दाम में किसानों से उपज खरीद स्टोर कर लेते थे । इससे भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य भी किसान खो सकते है तथा खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा । बहुराष्ट्रीय कंपनियां का अतिक्रमण बढ़ेगा । विपक्ष का कहना की सरकार सारी व्यवस्था कुछ पूंजीपतियों के हाथ मे देना चाहती है वैगरह वैगरह ।
इसके आलोक में यक्ष प्रश्न यह है कि -
* क्या पूर्व स्थिति संभव है जब बाजार का विस्तार हो गया है । अब बाजार का स्वरूप प्रतियोगी है ।
* विपणन समिति में व्याप्त अनियमितता जिसका नुकसान किसानों को होता है ।
* कृषि को आधुनिक बनाना ठेका कृषि आदि से नगद फसल को बढ़ावा मिलेगा ।
* खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है यह चिंतन का विषय है ।
* सरकार कृषि सब्सिडी, मुआवजा , खाद्य सुरक्षा का दायरा कम करना चाहती है ( शांता कुमार समिति की रिपोर्ट 2014 में गठित)
* MSP की गारंटी और कंपनियों का कब्जा?
कृषि मजदूर न बने ।
उपरोक्त प्रश्न के अलावा विचारणीय है कि यूरोप में ऐसा मॉडल कामयाब नही रहा ।
बिहार में 14 वर्ष पूर्व APMC खत्म किया गया लेकिन किसानों का सर्वाधिक पलायन बिहार से ही हुआ और व्यवस्था नही सुधर पाई ।
जब बिल किसानों के हित में है तो किसान संगठनों और नेताओं को विश्वास में लेना जरूरी है लेकिन जब जून में अध्यादेश आया था तब सब चुप क्यो थे। सरकार ने पूर्व में पारित अध्यादेश को कानून का रूप दिया तब विवाद खड़ी हुई इसमें राजनीति भी जमकर हो रही है ।
APMC के सुधार लेकर ये चर्चा नया नही है । अब बात न्यूनतम समर्थन मूल्य की तो ...सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे देश मे सिर्फ 6 प्रतिशत किसान ही इसका लाभ उठा पाते है सिर्फ 6 प्रतिशत । क्या इस व्यवस्था से कंपनियों का एकाधिकार स्थापित होगा या किसानों को अपनी उपज का सही दाम मिलेगा , ठेका कृषि से कृषि को व्यापारिक दर्जा हासिल होगा और क्या किसान 2022 तक अपनी आय दुगुना कर सकेंगे।
Tuesday, November 10, 2020
फ्रांस मे अभिव्यक्ति की आजादी बनाम धार्मिक कट्टरता और उसके वैश्विक प्रभाव
बीते दिनों फ्रांस में एक शिक्षक द्वारा पैगम्बर हजरत मोहम्मद के विवादित कार्टून दिखाए जाने से उसकी गला रेतकर हत्या एक कट्टर मुस्लिम युवक द्वारा कर दी गयी। वहां की सरकार ने विवादित कार्टून दिखाए जाने को लेकर शिक्षक का समर्थन किया और अपनी अभिव्यक्ति के आजादी की सुरक्षा को लेकर आतंकवाद का कड़े शब्दों में निंदा की । यह कार्टून फ्रांस की प्रसिद्ध मैगजीन 'शार्ली हेब्दो' के थे जिसे लेकर पूर्व में विवाद हो चुका है ।
फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल मैक्रो ने इसे कट्टर इस्लामी आतंकवाद का हमला कहा और उन्होंने इस्लाम को संकट में बता दिया ,इस्लामी चरमपंथी से निपटने में कठोर कार्यवाही की बात कही । उनके इस बयान से समस्त मुस्लिम देश और विश्व के मुस्लिम विरोध में उतर आए और विभिन्न तरीकों से विरोध दर्ज कराया । तुर्की और पाकिस्तान इसमें सबसे अगुवा रहे । तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयब एर्दोगन ने फ्रांस के राष्ट्रप्रमुख को मानसिक इलाज करवाने की सलाह दे दी और फ्रांस के समान का बहिष्कार का आह्वान किया और यही हाल पाकिस्तान का भी था । पाक ने संसद से एक प्रस्ताव पास कर फ्रांस से अपने राजदूत को वापस बुलाने का कदम उठाया बाद में पता चला की उनका फ्रांस में कोई राजदूत ही नही हैं । मलेशिया के 95 साल के पूर्व राष्ट्रपति महातिर मोहम्मद ने तो सारी हदें पार कर दी और इस हमले को जायज ठहराया। सऊदी अरब , ईरान , कतर आदि इस्लामिक राष्ट्र ने फ्रांस के समान का बहिष्कार कर विरोध प्रकट किया।
इसी बीच फ्रांस में लगातार और भी आतंकवादी हमले हुए , चर्च में तीन बेकसूर लोंगो की गला रेतकर हत्या कर दी गयी । सउदी अरब में फ्रांस के उच्चायुक्त कार्यालय के बाहर गार्ड पर चाकू से हमला कर दिया गया ।
विदित है कि फ्रांस की कुल आबादी का 9 प्रतिशत मुस्लिम है और ज्यादातर मुस्लिम शरणार्थी के रूप में फ्रांस में आये है । फ्रांस एक ऐसा राष्ट्र है जो धर्मनिरपेक्षता को केंद्र में रख अभिव्यक्ति की आजादी , समानता , और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वाधिक महत्व देता है । धर्मविहीन राज्य ही फ्रांस के राष्ट्रधर्म है और वहां ' लैसीते ' की अवधारणा प्रचलित है जिसका अर्थ है आम आदमी या जो पादरी नहीं है । इसका मतलब है कि व्यक्ति को मजहबी स्वतंत्रता होगी लेकिन वह कानून के दायरे में होगी कानून से बड़ा कोई नहीं है। फ्रांस ने पहले ही सार्वजनिक स्थल पर धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल पर रोक लगा दिया है । एक अनुमान के मुताबित फ्रांस में 1950 तक धर्म से मुक्त लोंगो की संख्या धर्म पालन करने वालो से अधिक होगी और यही फ्रांस की राष्ट्रीय पहचान है । उनका मानना है कि फ्रांस में रहना है तो इन नियमो का पालन करना होगा ।
यहां यह बात जानना जरूरी है की फ्रांस को विश्व मे अगर कोई देश का मजबूती से साथ मिला तो वह भारत है । भारत के विदेश मंत्रालय ने बकायदा एक सर्कुलर जारी करते हुए आतंकवादी हमले की निंदा की और इससे निपटने में फ्रांस के साथ देने के बात दोहराई । भारत और फ्रांस के वैदेशिक संबंध मजबूत है और विभिन्न समय पर फ्रांस ने भारत की मदद की है इसलिए भारत को ऐसा करना जरूरी भी था । भारत और फ्रांस में कई बातों को लेकर समानता है जैसे मुस्लिम दोनो जगह अल्पसंख्यक है ,दोनो लोकतंत्र है और समानता ,स्वतंत्रता और बंधुत्व दोनो के राजकीय आदर्श है , दोनो देश कई बार आतंकवादी हमलों से आहत हुए है ।
यहाँ एक बात महत्वपूर्ण है कि धर्मनिरपेक्षता को लेकर दोनों के विचार में मामूली अंतर है जहाँ फ्रांस राज्य और व्यक्ति को धर्म से मुक्ति का पक्षधर है वही भारत सभी धर्मों को राज्य से पृथक तो करता है परंतु अबाध रूप से मानने की स्वतंत्रता भी देता है .। भारत के संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता मौलिक अधिकारों का हिस्सा है ।
यह गौर करने वाली बात है कि अधिकतर मुस्लिम देश में लोकतंत्र नहीं है या है भी तो सिर्फ नाममात्र और स्वयं जिस देश मे मुस्लिम आबादी अधिक है वहां धर्मनिरपेक्षता सिर्फ एक जुमला है इसका उदाहरण हम पाकिस्तान , बांग्लादेश या अफगानिस्तान में देख ही रहे है कि कैसे वहां अल्पसंख्यक पर लगातार हमले हुए है और उनको कोई विशेषाधिकार नहीं है इसके विपरीत भारत में सभी धर्म के लोग आपसी सद्भाव और बंधुत्व से रहते है साथ अल्पसंख्यकों में लिए विभिन्न योजनाएं भी लागू है । भारत में मुस्लिमो की जनसंख्या लगभग 17 करोड़ से अधिक है और हिन्दू धर्म के बाद सर्वाधिक माने जाने वाला धर्म है ।
अरब के बहुत देश मे धर्म को लेकर या अन्य किसी कारण से गृह युद्ध चल रहा है और आये दिन सत्ता संघर्ष या चरमपंथी हमले में कई लोग अपना जान गवां देते है इसके कारण बड़ी मात्रा में पलायन यहां से यूरोप के देशों में हुआ है और लगातार जारी है । शरणार्थी समस्या एक बड़ी समस्या विश्व के देशों में रही है । रोहिंग्या संकट हमारे सामने है । रोहिंग्याओ को किसी भी देश ने शरण देने से साफ मना कर दिया और वे स्टेटलेस हो गए वे विभिन्न शरणार्थी कैम्पों में रहने को अभिशप्त है ।
विभिन्न देश जो स्वयं को मुस्लिम राष्ट्र घोषित कर चुके है वहां ' ईशनिंदा' से सम्बंधित कानून है अर्थात वहां ईश्वर की आलोचना करना या उनके बारे में अपशब्द कहने पर मृत्यु से लेकर आजीवन कारावास की सजा है । इस संबंध में एक अध्ययन के मुताबिक जहाँ ईशनिंदा कानून है वहां धार्मिक हिंसा और धर्म परिवर्तन की घटना अधिक देखी गयी है । एक संबंध में दोहरा रवैया भी देखने को मिलता है जब पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देश चीन में हो रहे उइगूर मुस्लिमों पर अत्याचार की घटना पर चुप रहते है और दूसरे देशों को इस पर घेरने से नही चूकते ।
पूरी विश्व जहां भूमंडलीकरण के कारण एक हो रही है वहां ऐसे धार्मिक झगड़े और कट्टरता से विश्व समुदाय को नुकसान ही है । विभिन्न मतों का सम्मान और उपहास व्यक्तिगत मामला हो सकता है लेकिन उसे समुदाय विशेष से जोड़ना और ध्रुवीकरण करना धार्मिक उन्माद ही पैदा करेगा, जहाँ आवश्यकता है संस्कृतिकरण और आपसी सद्भाव का वहां किसी भी धर्म को "सामी धर्म " होना समस्या ही उत्पन्न करेगा ।
गांधी युग पार्ट -2 सविनय अवज्ञा आंदोलन
1929 में लेबर पार्टी की सरकार बनी जिन्होंने गवर्नर जनरल लार्ड इरविन को इंग्लैंड बुलाया और मंत्रणा की जिसके अनुरूप इरविन ने घोषणा की ..भारत को अंत में औपनिवेशिक स्वराज्य दिया जाएगा जिसे लेकर गांधी ने इरविन से भेंट की लेकिन गांधी जी के पूछने पर उन्होंने पर्याप्त आश्वासन नहीं दिया इसी बीच लाहौर में कॉंग्रेस का अधिवेशन हुआ अब तक यह निश्चित हो गया कि नवगठित ब्रिटिश सरकार भी कुछ देने वाली नहीं है ।
तब क्षोभ और निराशा के माहौल में अधिवेशन बुलाया गया जिसमें पूर्ण स्वाधीनता के प्रस्ताव पास किये किये गए तथा रावी नदी के 31 दिसम्बर 1929 को मध्यरात्रि में तिरंगा फहराया गया और प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस मनाने का निर्णय लिया गया ।
सरकार द्वारा नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकृत कर दिया गया था था , कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में गांधी जी द्वारा प्रस्तुत 11 मांगे नहीं मानने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन की चेतावनी दी गयी । परंतु ब्रिटिश सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया और प्रसिद्ध दांडी यात्रा से नमक कानून का उल्लंघन कर " सविनय अवज्ञा आंदोलन " का श्री गणेश किया गया ।
इस आंदोलन के कार्यक्रम में नमक बनाना , विदेशो वस्रों की होली , शराब -अफीम की दुकानों पर धरना , अश्पृश्यता का त्याग , सरकारी शिक्षण संस्थानों का त्याग तथा जंगल कानून तोड़ा गया । सरकार ने आंदोलन को बढ़ता देख तीव्र दमन चक्र चलाया और बड़ी मात्रा में गिरफ्तारी , जेल भरो , सरकार ने संपत्ति की नीलामी और बलात ग्रहण किया , कॉंग्रेस को अवैध संगठन घोषित कर दिया
इन्ही परिस्थितियों में प्रथम गोलमेज सम्मेलन नवम्बर 1930 में बुलाया गया जिसमें कांग्रेस ने भाग नही लिया। ब्रिटिश शासन को समझ आ गया कि कांग्रेस से बातचीत किये बिना समस्या का हल नही होगा और इरविन , गांधी जी से बात करने राजी हो गए ।
1931 में प्रसिद्ध गांधी इरविन समझौता हुआ कुछ कांग्रेसी इस समझौते से प्रसन्न नहीं थे , सुभाषचंद्र बोस और उनके समर्थकों ने तीव्र असंतोष प्रगट किया उनका मत था इतने बड़े बलिदान पर विशेष लाभ नहीं मिला । युवा वर्ग निराश इसलिए थे क्योंकि गांधी जी ,भगतसिंह और उनके साथी की सजा परिवर्तित नहीं करा सके । 1931 में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया गांधी जी इसमें शामिल हुए इस सम्मेलन से कोई समस्या का हल नहीं निकला और सम्मेलन पूरी तरह असफल रहा ।
विलिंगटन भारत ने नए गवर्नर जनरल बनें उन्होंने गांधी इरविन समझौत के सभी शर्तों भंग करना आरंभ किया । गांधी जी पुनः सविनय आंदोलन प्रारम्भ कर दिए जिसका कठोर दमन किया गया । गांधी जी को बंदी बना जेल में डाल दिया कांग्रेस को अवैध संगठन घोषित कर दिया , समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया । 1934 में आंदोलन स्थगित हो गया ।
सविनय अवज्ञा आंदोलन की खास बात रही इसमे महिलाओ ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया विभिन्न स्थानों पर जंगल सत्याग्रह से लोंगो में ब्रिटीश सरकार का विरोध करने की हिम्मत आयी , और निराशा के दौर में स्वतंत्रता संग्राम को हवा देती रही । ब्रिटिश सरकार अब भारतीय नेतृत्व गांधी जी से समझौता करने की स्थिति में आ गयी थी ।
