Friday, November 13, 2020

नए कृषि कानून और विवाद

           17 सितंबर को लोकसभा में पास कृषि सुधार के तीन बिलो को लेकर कई राज्यों के किसान सड़क पर है । विपक्ष के सभी दल विरोध कर रहे है साथ ही सरकार की सहयोगी अकाली दल भी किसानों के साथ खड़ी है और विरोध कर रही है । 

           विरोध का मुख्य कारण तीनो बिलो में किये प्रावधानों को लेकर है जो निम्न है -

1) किसान अपना उपज स्थानीय विपणन समिति के अलावा कही भी विक्रय कर सकता है । न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार खत्म नहीं करेगी और सरकारी खरीद भी जारी रहेगी ।

2) आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव से अब स्टॉक की अधिकतम सीमा हटा दी गयी है अर्थात व्यापारी अब कितना भी समान अपने गोदामो में रख सकता है । 

3) अब किसान अपनी  जमीन ठेका पर दे सकता है अर्थात ठेका कृषि को प्रोत्साहन। 


        उपरोक्त प्रावधानों  के विरोध का मुख्य कारण और इस पर किसान संगठनों की राय है -- 

1) सरकार जब अभी MSP नही दिला पा रही है तो निजी खरीद प्रक्रिया से तो और संभव नही है। इससे किसान का माल  और कम मूल्य में खरीदा जाएगा । 

2 ) स्टॉक की सीमा तय नहीं होने से कालाबाजारी बढ़ेगा और व्यापारी गोदामो में अधिक माल को रख सकेंगे । 

3) ठेका पर खेती होने से सरकार सब्सिडी खत्म कर देगी और मुआवजा आदि भी खत्म हो जाएगा किसान से जमीन छिन जागेगी और कृषक ,मजदूर बन जाएंगे । 


          सरकार का मत है इस बिल से किसानों फायदा होगा और ये क्रांतिकारी परिवर्तन है । 

1) सरकार बाजार में प्रतियोगिता को बढ़ावा देना चाह रही है ताकि किसान के फसल का मूल्य बढ़े और कही भी बेच सके वन नेशन वन मार्किट । 

2) स्टॉक की सीमा हटने से बड़ी कंपनियां किसानों से माल खरीदेगी और गोदामो में रख सकेगी।

3) ठेका कृषि वर्तमान की जरूरत है जहाँ खेती के रकबे के कमी और चको का आकार छोटा हो रहा है वहां ठेका खेती से छोटे किसान लाभान्वित होंगे। 

4) सरकार MSP खत्म नहीं करेगी जिससे मंडी में बेचना है वो बेच सकते है। 


            कृषि विशेषज्ञ और किसान इसे किसान विरोधी मानते है उनका कहना है इससे पहले जैसे समस्या  निर्मित हो सकती है जब सेठ साहूकार कम दाम में किसानों से उपज खरीद स्टोर कर लेते थे । इससे भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य भी किसान खो सकते है तथा खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा । बहुराष्ट्रीय कंपनियां का अतिक्रमण बढ़ेगा  । विपक्ष का कहना की सरकार सारी व्यवस्था कुछ पूंजीपतियों के हाथ मे देना चाहती है वैगरह वैगरह । 

        इसके आलोक में यक्ष प्रश्न यह है कि - 

* क्या पूर्व स्थिति संभव है जब बाजार का विस्तार हो गया है । अब बाजार का स्वरूप  प्रतियोगी है । 

* विपणन समिति में व्याप्त अनियमितता जिसका नुकसान किसानों को होता है । 

* कृषि को आधुनिक बनाना ठेका कृषि आदि से नगद फसल को बढ़ावा मिलेगा । 

* खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है यह चिंतन का विषय है । 

*  सरकार कृषि सब्सिडी, मुआवजा  , खाद्य सुरक्षा का दायरा कम करना चाहती है ( शांता कुमार समिति की रिपोर्ट 2014 में गठित) 

*  MSP की गारंटी और कंपनियों का कब्जा? 

कृषि मजदूर न बने । 


      उपरोक्त प्रश्न के अलावा विचारणीय है कि यूरोप में ऐसा मॉडल कामयाब नही रहा ।


बिहार में 14 वर्ष पूर्व APMC  खत्म किया गया लेकिन किसानों का सर्वाधिक पलायन बिहार से ही हुआ और व्यवस्था नही सुधर पाई । 

          जब बिल किसानों के हित में है तो किसान संगठनों और नेताओं को विश्वास में  लेना जरूरी है  लेकिन  जब जून में अध्यादेश आया था  तब सब चुप क्यो थे। सरकार ने पूर्व में पारित अध्यादेश को कानून का रूप दिया तब विवाद खड़ी हुई इसमें  राजनीति भी जमकर हो रही है । 

       APMC के सुधार लेकर ये चर्चा नया नही है । अब बात न्यूनतम समर्थन मूल्य की तो ...सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे देश मे सिर्फ 6 प्रतिशत किसान ही इसका लाभ उठा पाते है सिर्फ 6 प्रतिशत । क्या इस व्यवस्था से कंपनियों का एकाधिकार स्थापित होगा या किसानों को अपनी उपज का सही दाम मिलेगा , ठेका कृषि से कृषि को व्यापारिक दर्जा हासिल होगा और क्या किसान 2022 तक अपनी आय दुगुना कर सकेंगे। 


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